विश्व शरणार्थी दिवस – 20 जून
( वसुधैव कुटुम्बकम् ) 
रचना *डॉ अनमोल कुमार*
सरहद पर काँटे लगे हैं,
पर धरती तो एक ही है।
पासपोर्ट जला, घर उजड़ा,
पर इंसानियत नेक ही है।
कौन है शरणार्थी?
वो बच्चा जिसके बस्ते में
किताब नहीं, डर भरा है।
वो माँ जिसके आँचल में
रोटी नहीं, आँसू धरा है।
बम के धमाकों से भागा,
भूख के मारे जागा,
समंदर की लहरों में
किस्मत को आजमाने लगा।
20 जून क्यों?
संयुक्त राष्ट्र ने कहा –
"इनकी भी सुनो, ये भी हम हैं।"
20 जून को दुनिया याद करती है
कि घर छोड़ना मजबूरी है, शौक नहीं।
आज 12 करोड़ से ज्यादा लोग
बेघर हैं अपनी ही धरती पर।
सीरिया, यूक्रेन, म्यांमार, अफगान –
दर्द का रंग एक, बस नाम अलग।
वसुधैव कुटुम्बकम्
हमारे वेदों ने सिखाया –
"अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥"_
ये मेरा-तेरा छोटी सोच है,
बड़े दिल वालों के लिए
पूरी धरती ही परिवार है।
जब गाँव जले तो गुमला ने जगह दी,
जब बंटवारा हुआ तो भारत ने बाँहें खोलीं।
तिब्बत से आए तो धर्मशाला अपना बना,
बांग्लादेश से आए तो बंगाल ने गले लगाया।
हम क्या करें?
नफरत नहीं, हमदर्दी – वो दुश्मन नहीं, हालात के मारे हैं।
आवाज बनो – उनके हक की बात करो, अफवाह नहीं।
हिस्सा बाँटो – एक जोड़ी कपड़ा, एक वक्त की रोटी बहुत है।
बच्चों को पढ़ाओ – शरणार्थी कैंप में स्कूल सबसे बड़ा मंदिर है।
याद रखो – कल को हम भी हो सकते हैं, वक्त का क्या भरोसा।
अंतिम प्रार्थना
ऐ खुदा, ऐ ईश्वर, ऐ वाहेगुरु –
कोई भी बच्चा सरहद पर न रोए।
कोई भी माँ नाव में जान न खोए।
बंदूक की जगह किताब मिले,
टेंट की जगह छत मिले।
जब तक एक भी इंसान बेघर है,
धरती पूरी नहीं, अधूरी है।
विश्व शरणार्थी दिवस पर संकल्प लें –
न दीवार उठेगी, न नफरत पलेगी,
जब दिल में बसेगा वसुधैव कुटुम्बकम्
एक छत, एक आस, एक इंसानियत
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