स्त्री मोहताज नहीं गुलाब की, वह बागवान है इस कायनात की
कुमार महेंद्रउसे कोमल कहकर केवल,
तुम सीमाओं में मत बाँधो।
वह केवल मुस्काती कली नहीं,
उसके स्वप्नों को पहचानो।
तोड़ हर बेड़ी अन्यायों की,
बनती धारा नव प्रभात की।
स्त्री मोहताज नहीं गुलाब की, वह बागवान है इस कायनात की।।
गुलाब तो मुरझा जाता है,
कुछ पल अपनी महक बिखेरकर।
वह पीढ़ियों को सींच रही,
अपना सर्वस्व लुटाकर।
उसकी ममता में सृजन खिले,
दीप्ति है उसके स्वाभिमान की।
स्त्री मोहताज नहीं गुलाब की, वह बागवान है इस कायनात की।।
कभी दुर्गा, कभी महाकाली,
वक्त पड़े तो चंडी बन जाए।
अन्यायों की हर दीवारों को,
अपने साहस से ढहाए।
त्याग, तपस्या, धैर्य की प्रतिमा,
वह अमिट गाथा बलिदान की।
स्त्री मोहताज नहीं गुलाब की, वह बागवान है इस कायनात की।।
वह घर-आँगन भी महकाती,
नभ में अपना परचम फहराती।
उसके दृढ़ संकल्पों के आगे,
किस्मत भी शीश झुकाती।
मत समझो उसको दुर्बल तुम,
वह शक्ति-स्तंभ मानव जात की।
स्त्री मोहताज नहीं गुलाब की, वह बागवान है इस कायनात की।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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