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जिसमें सुर न हो वह साज़ बदल डालो

जिसमें सुर न हो वह साज़ बदल डालो

रचना: डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
जिसमें सुर न हो वह साज़ बदल डालो,
जो मधुर न हो वह अल्फ़ाज़ बदल डालो।


खाने के लिए तो लोग कुछ भी खाते हैं,
तामस भरा हो वो अनाज बदल डालो।


अगर ऊँचाई पाने की चाहत रखते हो,
तो फिर जीने का अंदाज़ बदल डालो।


जो अँधेरों में रखे कैद तुम्हारी सोच को,
ऐसे हर दकियानूसी रिवाज़ बदल डालो।


नफ़रतों की आग में जलते रहे गर रिश्ते,
तो दुश्मनी का वो आगाज़ बदल डालो।


जो तुम्हें मंज़िल से भटका रहा है राह में,
ऐसे हर कपटी हमराज़ बदल डालो।


"राकेश" आईना दिखाए न तुम्हारी ख़ामियाँ,फिर तो चेहरा नहीं, मिज़ाज बदल डालो।
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