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नैतिक चेतना का महाकुंभ बना बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन 2026

नैतिक चेतना का महाकुंभ बना बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन 2026

  • मुजफ्फरपुर में जुटे बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के बुद्धिजीवी, विनोबा भावे के ‘जय जगत’ संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का लिया संकल्प

मुजफ्फरपुर, बिहार।
संत विनोबा भावे के विचारों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक समरसता के संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से बिहार के मुजफ्फरपुर में 30 एवं 31 मई 2026 को आयोजित द्विदिवसीय बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन 2026 एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायी आयोजन के रूप में संपन्न हुआ। नवयुवक समिति ट्रस्ट के सभागार में आयोजित इस सम्मेलन में बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आए शिक्षाविदों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समाजसेवियों तथा भूदान आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भाग लेकर वर्तमान समय की चुनौतियों और उनके समाधान पर गंभीर मंथन किया।

सम्मेलन का उद्घाटन आचार्यकुल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रख्यात शिक्षाविद आचार्य डॉ. धर्मेंद्र ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। कार्यक्रम का शुभारंभ संत विनोबा भावे के चित्र पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित कर हुआ। इसके पश्चात पूरे सभागार में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जय जगत’ के उद्घोष गूंज उठे, जिससे वातावरण राष्ट्रभक्ति और वैचारिक चेतना से ओतप्रोत हो गया।

समाज को नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता : डॉ. धर्मेंद्र


उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए आचार्य डॉ. धर्मेंद्र ने कहा कि आज समाज वैचारिक प्रदूषण, राजनीतिक ध्रुवीकरण और नैतिक पतन जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है। ऐसे समय में आचार्यकुल की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और विचारकों को सत्ता तथा व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सत्य और समाजहित की आवाज बनना होगा।

उन्होंने कहा कि जब तक बौद्धिक वर्ग निर्भीकता के साथ निष्पक्ष विचार प्रस्तुत नहीं करेगा, तब तक समाज को सही दिशा नहीं मिल सकेगी। आचार्यकुल का उद्देश्य भी ऐसे ही नैतिक नेतृत्व का निर्माण करना है।

विनोबा भावे के विचार आज भी प्रासंगिक


सम्मेलन में आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रवक्ता सत्येन्द्र कुमार पाठक ने संत विनोबा भावे द्वारा स्थापित आचार्यकुल और भूदान यज्ञ की मूल अवधारणाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भूदान आंदोलन केवल भूमि वितरण का अभियान नहीं था, बल्कि यह सामाजिक समरसता, मानवीय संवेदनाओं और हृदय परिवर्तन का आंदोलन था।

उन्होंने वर्तमान समय में बची हुई भूदान भूमि के संरक्षण, डिजिटलीकरण और वास्तविक भूमिहीनों तक उसके लाभ पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आर्थिक विषमता और सामाजिक असंतुलन से जूझ रहे वर्तमान समाज में विनोबा भावे के विचार नई दिशा देने में सक्षम हैं।

विद्वानों ने रखे विचार


सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में देश के अनेक प्रतिष्ठित शिक्षाविदों और समाजसेवियों ने अपने विचार व्यक्त किए।

सम्मेलन स्वागत समिति की उपाध्यक्ष डॉ. संगीता सागर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि मुजफ्फरपुर की ऐतिहासिक धरती पर आयोजित यह सम्मेलन समाज में नई वैचारिक ऊर्जा का संचार करेगा।

आचार्यकुल की कला-संस्कृति प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय प्रभारी डॉ. उषा श्रीवास्तव ने वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि युवा पीढ़ी तक नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को पहुंचाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

डॉ. पी. एल. यति, कुलपति, थावे विद्यापीठ ने कहा कि आज के शैक्षणिक संस्थानों को केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि चरित्रवान और समाज का मार्गदर्शन करने वाले आचार्य तैयार करने चाहिए।

डॉ. जंग बहादुर पांडेय, पूर्व विभागाध्यक्ष, रांची विश्वविद्यालय ने साहित्य और समाज के संबंधों पर प्रकाश डालते हुए विनोबा भावे के साहित्य को शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की वकालत की।

पूर्व कुलपति आर.सी. राय शर्मा, डॉ. मोनालिसा, डॉ. सुधा सिन्हा, डॉ. पुष्पा गुप्ता तथा अन्य वक्ताओं ने भी नैतिक शिक्षा, सामाजिक समरसता और बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता पर बल दिया।
सामाजिक पुनर्जागरण में मीडिया की भूमिका

सम्मेलन के दूसरे दिन आयोजित विशेष पत्रकार सम्मेलन में मीडिया की वर्तमान चुनौतियों और उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों पर गंभीर चर्चा हुई।

'निर्माण भारती' के संपादक जी.एन. भट्ट, 'दिव्य रश्मि' के संपादक डॉ. राकेश दत्त मिश्र तथा वरिष्ठ पत्रकार अनमोल ने कहा कि आज पत्रकारिता को राजनीतिक और कॉरपोरेट प्रभाव से मुक्त होकर जनसरोकारों की आवाज बनना होगा।

वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा प्रदान करना भी है। उन्होंने आचार्यकुल के निष्पक्षता और नैतिकता के सिद्धांतों को पत्रकारिता के लिए आदर्श बताया।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने मोहा मन

सम्मेलन में केवल वैचारिक चर्चा ही नहीं हुई, बल्कि सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से विनोबा भावे के विचारों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया।

स्वर्णिम कला केंद्र के कलाकारों ने ‘जय जगत’ और ‘भूदान यज्ञ’ की अवधारणाओं पर आधारित नृत्य-नाटिका और प्रेरक गीतों की प्रस्तुति देकर उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। कलाकारों ने तेलंगाना के पोचमपल्ली से शुरू हुए भूदान आंदोलन की झलक मंच पर प्रस्तुत की, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।

कवि सम्मेलन में गूंजे सामाजिक सरोकार


सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित कवि सम्मेलन में गोरखपुर के सुप्रसिद्ध कवि मुक्तिनाथ त्रिपाठी, कवयित्री डॉ. पुष्पा गुप्ता सहित अनेक साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों, मानवीय मूल्यों के क्षरण और राष्ट्रीय एकता के विषयों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कवियों ने समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और नैतिक पतन पर चिंता व्यक्त करते हुए मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का आह्वान किया।

नई कार्यकारिणी का गठन

सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बिहार राज्य आचार्यकुल की नई कार्यकारिणी का गठन रहा। लोकतांत्रिक एवं सर्वसम्मत प्रक्रिया के तहत डॉ. उषा श्रीवास्तव को बिहार राज्य आचार्यकुल का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।

नई कार्यकारिणी में:

  • अध्यक्ष - डॉ. उषा श्रीवास्तव
  • उपाध्यक्ष - डॉ. संगीता सागर
  • मंत्री- डॉ. राकेश दत्त मिश्र
  • कार्यकारी संगठक - चंद्रशेखर भाई

को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं।

अपने संबोधन में नवनिर्वाचित अध्यक्ष डॉ. उषा श्रीवास्तव ने कहा कि वे विनोबा भावे के विचारों को गांव-गांव तक पहुंचाने और बिहार के प्रत्येक जिले एवं प्रखंड में आचार्यकुल की इकाइयों का विस्तार करने के लिए कार्य करेंगी।

समाज सेवा के लिए सम्मान


सम्मेलन के समापन अवसर पर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आए साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों और भूदान कार्यकर्ताओं को उनके उत्कृष्ट सामाजिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

मुख्य अतिथि एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा सभी सम्मानित व्यक्तियों को अंगवस्त्र, स्मृति चिन्ह एवं सम्मान पत्र प्रदान किए गए।

आज भी प्रासंगिक है ‘जय जगत’ का संदेश


समापन सत्र में वक्ताओं ने कहा कि आज विश्व आर्थिक असमानता, वैचारिक संघर्ष और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में संत विनोबा भावे का ‘जय जगत’ का संदेश पूरी मानवता को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि भूदान और संपत्तिदान जैसे विचार आज के दौर में सामाजिक उत्तरदायित्व, साझी समृद्धि और मानवीय सहयोग के नए मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

नैतिक पुनर्जागरण का संकल्प

दो दिवसीय बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन 2026 केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज में नैतिक पुनर्जागरण, वैचारिक शुद्धता और मानवीय मूल्यों की स्थापना का एक सशक्त अभियान सिद्ध हुआ। सम्मेलन का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि संत विनोबा भावे के ‘जय जगत’ और ‘भूदान’ के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया जाएगा तथा समाज में निष्पक्ष, नैतिक और मानवीय नेतृत्व विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।मुजफ्फरपुर की धरती पर आयोजित यह सम्मेलन आने वाले समय में सामाजिक चेतना, नैतिक नेतृत्व और वैचारिक पुनर्जागरण के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।

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