नारी केवल सौंदर्य की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि संस्कृति, गरिमा, प्रेम और शक्ति का अनुपम स्वरूप है।
भारतीय परंपरा के “सोलह श्रृंगार” केवल अलंकार नहीं, बल्कि भावनाओं, सौभाग्य और दाम्पत्य की मधुर अभिव्यक्ति हैं।
सोलह श्रृंगार : नारी गरिमा के अलंकार
कुमार महेंद्रबिंदी शोभित भाल सुहावन,
ज्यों अरुणिम रवि-किरण प्रभा।
कुमकुम पावन प्रेम-सुगंधित,
नारी-शक्ति दिव्य आभा।
मांग सजी सिंदूर मनोरम,
प्रिय के चिर-जीवन का सार।
सोलह श्रृंगार, नारी गरिमा के अलंकार।।
काजल-रेखा नयनन में बस,
हर ले मन के संताप।
मेहंदी रचे करों में जैसे,
प्रेमिल सपनों का आलाप।
लाल-हरी रंग-बिरंगी चूड़ियाँ,
सुख-सौभाग्य का विस्तार।
सोलह श्रृंगार, नारी गरिमा के अलंकार।।
मंगलसूत्र सुहाग प्रतीक,
दाम्पत्य-बंधन की भाषा।
नथ की छवि लजवंती मुस्काए,
केशों में गजरे की आशा।
मांग-टीका सात्विक शोभा,
झुमकों की झंकार अपार।
सोलह श्रृंगार, नारी गरिमा के अलंकार।।
बाजूबंद वैभव की गरिमा,
कमरबंद मधुरिम अनुबंध।
बिछिया साहस की संवाहक,
पायल रचती मंगल-छंद।
अंगूठी प्रणय-प्रतिज्ञा पावन,
स्निग्ध यौवन मधुमय बहार।
सोलह श्रृंगार, नारी गरिमा के अलंकार।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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