ज्येष्ठ मास महात्मय {अठारहवां अध्याय} 

आनन्द हठीला
भीमसेन व्यासजी से बोले कि हे तात ! जो आपने एकादशी का व्रत और उसका अद्भुत माहात्म्यं कहा है, वह मूढ चित्त होने के कारण मुझको सत्य प्रतीत नहीं होता है ॥ १ ॥
इसलिये वात्सल्य भावना का त्याग कर सत्य वचन कहिये । हे तात! यदि आप सत्य वचन न कहेगे तो मैं विदुर वचन (धृतराष्ट्र के प्रति जो विदुर के प्रोक्त वचन) है उनके समानःनष्ट हो जाऊँगा ॥ २॥
हे तात ! मन्त्री पुरोहित और वैद्य ये तीन जिसके साथ प्रिय वचन बोलते हैं उसके कोश (धननिधि), धर्म और शरीर इन तीनों का नाश हो जाता है ॥३॥
व्यास जी बोले कि हे भीमसेन ! हे वत्स ! हमने पहिले जो संक्षेप में आपसे कहा है, हे पवनपुत्र ! वह सर्वथा सत्य है उसको मिथ्या नहीं मानना ॥४॥
मैं इस विषय में पुरातन इतिहास को कहूँगा, तुम्हारा संशय विशाख (स्कन्द जी) के वचन श्रवण से दूर हो जायगा ।।५।।
पूर्वकाल में कालाञ्जन पर्वत पर पुलिन्द नाम से विख्यात समस्त धर्म का ज्ञाता राजा हुआ। उसने निष्कण्टक राज्य करके ।। ६ ।।
वहाँ द्वारिका के समान महान् पुर बनाया। और स्वयं अनेकों रथ, पत्ती (सेना) ऐरावत समान हाथी ॥ ७ ॥
उच्चैःश्रवा समान अनेकों घोड़ा से परिवारित (आवृत) होकर और सचिवों मे अनुमोदित वह राजा विजययात्रा के लिये निकला ॥ ८॥
सौ योजन मे विस्तृत राजा की सेना पुर (नगर) से निकली, और राजा के साथ चलने वाली वह सेनाङ्ग जो पदाति (पैदल सेना) है वह पृथिवी को आच्छादित कर जा रही थी ॥९॥
और सात व्यूह '' (रचना विशेष) से युक्त वह सेना सात महा समुद्र के समान मालूम होती थी। राजा पुलिन्द ने बड़े २ माण्डलिक, वीर, राजा और राजसेवकों को जीत लिया ॥ १० ॥
और उनसे विपुल (बहुत) कर भार लेकर पुर को गया। उसी तरह भूलोक के चक्रवर्ती राजाओ को जीत कर ॥ ११ ॥
जिस जिस सेनापति को बलवान् सुनता था, मद से गर्वित वह राजा पुलिन्द वहाँ वेगपूर्वक जाकर उनको जीतता था ॥ १२ ॥
इस तरह पर्यटन करते राजा पुलिन्द से चारों (गुप्तचरों) ने आकर कहा कि हे राजन् ! सभों का मालिक परम धर्मात्मा एक राजा है ॥ १३॥
जो कि श्रुति स्मृति पुराण का वेत्ता, देवता अतिथि का पूजक, शूर और सत्यप्रतिज्ञ है, उसको किसी ने भी नही जीता है, ॥१४॥
उसको विना जीते इस भूमण्डल मे आपकी कीर्ति सुतोपिणी (सन्तुष्ट करने वाली) न होवेगी। गुप्तचरों के यह वचन सुनकर अपने मन्त्रियों के साथ उस राजा पुलिन्द ने ॥ १५ ॥
सेना सहित प्राचीन वीं के सम्पूर्ण नगर को जाकर चारों तरफ से अच्छी तरह घेर लिया और पुलिन्द के सैनिक उस नगर के चारो तरफ स्थित हो गये ॥ १६ ॥
जैसे वन में वृकों (सियारों) के भुण्ड से एक सिह घेर लिया जाय, इस तरह उसे चारो तरफ से घेर लिया। हे तपोधन । उस समय उस नगर मे बड़ा कोलाहल मचा ॥ १७ ॥
कुछ लोगों ने राजा से, कुछ लोगो ने मन्त्रियों से जाकर समाचार कहा। हे राजन् ! उस दिन ज्येष्ठमास के शुक्लतच्क्ष की एकादशी तिथि थी ।॥ १८ ॥
उस नगर के वासी सभी लोग स्नान कर प्रसन्नता के साथ विष्णु पूजा मे रत हो गये और विष्णु भगवान् मे लीन होने के कारण परस्पर बात चीत भी नहीं करते थे ॥ १९ ॥
उस समय राजा पुलिन्द के सैनिक ग्राम में घुस गये और लूटने में लग गये, उन लुटेरों को किसीने मना न किया ॥ २० ॥
इसी बीच में किसी ग्रामवासी ने राजा पुलिन्द को नमस्कार कर हाथ जोड़कर साम (शान्ति) उपाय से यह वचन कहा कि ॥ २१ ॥
हे नृपश्रेष्ठ ! आज पुण्यप्रद एकादशी का व्रत है, हे राजन् ! समस्त नागरिकों के साथ राजा उपासना मे स्थित है ॥ २२ ॥
और आज नागरिक लोग तथा राजा भोजन, भाषण, हिंसा, मिथ्या वचन, दोषकर्म न करेगे ॥ २३ ॥
इसलिये हे राजन् ! आज और कल्ह के लिये द्या कीजिये और मैं राजा की आज्ञा से नहीं आया हूँ, परन्तु मैं आपसे यहाँ की निश्चित जो वात है उसको कहता हूँ ॥ २४ ॥
हे नृपते ! दो दिन तक आप जो कुछ करेंगे राजा वह सब सहन करेंगे, परन्तु परसों क्या होगा ? यह मैं नहीं जानता ॥२५॥
इति श्रीभविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसाद-व्यासेन कृतायां भाषाटीकायां अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
क्रमशः...
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