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"आख़िरी कसक"

"आख़िरी कसक" 

डॉ, रवि शंकर मिश्र "राकेश"
वह थी भोली मगर इतनी झूठी न थी,
कई वर्षों से वो मुझसे रूठी न थी।

मैंने सोचा था मुझको ही चाहा करेगी,
उम्र भर साथ मेरा निभाया करेगी।
मेरे सुख-दुख में हर पल जो शामिल रही,
वक्त आने पे वो इतनी बेरुखी तो न थी।
वह थी भोली मगर इतनी झूठी न थी,
कई वर्षों से वो मुझसे रूठी न थी।

पर जो देखा तो आँखों को विश्वास न था,
मेरी चाहत का उसके पास अहसास न था।
मैं जिसे प्यार की आख़िरी मंज़िल कहूँ,
उसके दिल में तो मेरा निशान तक न था।
वह थी भोली मगर इतनी झूठी न थी,
कई वर्षों से वो मुझसे रूठी न थी।

एक-एक ख़्वाब मैंने सजाया बहुत,
अपने अरमानों को भी बचाया बहुत।
किन्तु रिश्ते की बुनियाद जब खोखली निकली,
उसमें धोखा ही धोखा था, सच्चाई न थी।
वह थी भोली मगर इतनी झूठी न थी,
कई वर्षों से वो मुझसे रूठी न थी।

अब न शिकवा है कोई, न कोई गिला,
जो मिला है उसी को समझता भला।
बस यही दर्द दिल में कहीं रह गया,
जिसको अपना कहा, वो हमारी न थी।
वह थी भोली मगर इतनी झूठी न थी,
कई वर्षों से वो मुझसे रूठी न थी।

छोड़ राकेश शिकवा-शिक़ायत भी अब,
जो मिला ज़िंदगी में, समझ उसको भला।
बस यही एक कसक दिल में ज़िंदा रही,
जिसको अपना कहा वो हमारी न थी।
वह थी भोली मगर इतनी झूठी न थी,
कई वर्षों से वो मुझसे रूठी न थी।
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