वृद्धाश्रम क्यों बढ़ते जा रहे
अरुण दिव्यांशकैसे हुए हैं आज के मानव
कैसा हुआ आज ये समाज ।
कैसी हुई उनकी धारणाऍं ,
कहाॅं गये मानवत्व के ताज ।।
पुत्र बना कभी है भार नहीं ,
पिता बने कैसे आज भार ।
पुत्र हेतु पिता तो हारा नहीं ,
पिता हेतु पुत्र ने माना हार ।।
अपना परिजन पराया हुआ ,
पराया हुआ आज ये द्वार ।
इसे विधि का विधान कहूॅं ,
या भाग्य लेखा हो स्वीकार ।।
अपना पुत्र भी पराया हुआ ,
पराया पुत्र ही हुआ अपना ।
आज वही हमारा पुत्र बना ,
न देखा था जिसका सपना ।।
जमाने से ही बन पाते हम हैं ,
या हमसे बनता ये जमाना ।
जमाना देता हमें है चुनौती ,
हमदोनों को ये आजमाना ।।
चढ़े हैं स्वार्थ की ऊॅंची चोटी ,
तेजी से युवा कढ़ते जा रहे ।
कोई चुनौती दिया युवा को ,
वृद्धाश्रम भी बढ़ते जा रहे ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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