वाणी
अरुण दिव्यांशवाण से वाणी बना ,
वाणी से वाणिज्य ।
वाणी से व्यवहार है ,
वाणी सा न दूज्य ।।
वाणी सा दूज्य नहीं ,
वाणी सा न पूज्य ।
सभ्य मधुर निष्ठा ,
शृंगार न ऐसे दूज्य ।।
वाण बेधता तन को ,
वाणी बेधता है मन ।
घायल दिल बेचारा ,
जीवित मरता तन ।।
वाणी कारण देव देवी ,
वाणी कारण दानव ।
वाणी कारण अधम ,
वाणी कारण मानव ।।
वाणी कारण नारायण ,
वाणी कारण यह नर ।
वाणी मूल्य बहुमूल्य है ,
वाणी क्षीर वाणी शर ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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