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"चमत्कार-दृष्टि का आलोक"

"चमत्कार-दृष्टि का आलोक"

पंकज शर्मा
जीवन की व्याख्या बाह्य परिस्थितियों से अधिक हमारी दृष्टि पर निर्भर करती है। जो मन हर वस्तु को सामान्य मानकर चलता है, वह अनुभवों के विराट वैभव से स्वयं को वंचित कर लेता है। उसके लिए प्रभात का उदय, वर्षा की बूँदें, अथवा मानवीय संवेदनाएँ—सब केवल घटनाएँ रह जाती हैं, जिनमें न कोई रहस्य है, न कोई रोमांच। ऐसी दृष्टि जीवन को यांत्रिक बना देती है, जहाँ अनुभूति की ऊष्मा क्षीण पड़ जाती है।

इसके विपरीत, जब व्यक्ति प्रत्येक क्षण में चमत्कार का साक्षात्कार करता है, तब साधारण भी असाधारण बन उठता है। यह दृष्टिकोण आत्मा को विस्तार देता है, संवेदनाओं को गहराई प्रदान करता है, एवं अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता का भाव जाग्रत करता है। तब जीवन केवल व्यतीत होने वाली प्रक्रिया नहीं रहता, बल्कि एक दिव्य अनुभव बन जाता है—जहाँ हर श्वास में सृजन का संगीत स्पंदित होता है।

. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) 
 पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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