निर्णय क्षमता नही है
संजय जैनमेरा तेरा करते हम सब
कहाँ से कहाँ पहुँच गये।
थोड़ा धैर्य से देखो तुम तो
सच्चाई दिख जायेगी फिर।
दशा क्या है देश की देखो
जल्दी सबको समझ आयेगी।
गूँगे बैहरे बने रहे तो
जिंदगी यूँही बीत जायेगी।।
जख्म इतने गैहरे हो गये
जिनको भरना मुश्किल है।
सही उपचार करने वाला
अब डाक्टर कोई बचा नही।
विद्वमानो को भी देखो
कागज के शेर कैसे बन गये।
नजर उठा कर देखने की
हिम्मत किसी में बची नही।।
ठेला चलाने को यदि
मोटर चालने को दे दे।
तो जल्दी दुर्घटना होने की
संभावनाएं बन जाती है।
इसी तरह अनाड़ी कोई
घर का मुखिया बन जाये।
तो बर्बादी निश्चित है फिर
क्योंकि वो अयोग्य जो है।।
अब वो दिन भी दूर नही है
जब सब कुछ बिक जायेगा।
लेकर कटोरा घर का मुखिया
कर्जा मांगने दौड़ने लगेगा ।
और घर के ईमान को वो
गिरवी फिर रख देगा।
पर मेहनत करके कमाने की
कौशिस कभी नही करेगा।।
मुफ्त में बाँटते रहेंगे हम
अपने ईमान और वादों को।
मेहनत करने की लोगों को
सलाह कभी भी नही देगा।
बिक जाये घर द्वार भले ही
पर काम-धाम नही करेगा।
दो वक्त की रोटी के लिए
पर भीखमंगा बन जायेंगा।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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