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प्यारा गाँव, न्यारा गाँव

प्यारा गाँव, न्यारा गाँव

सत्येन्द्र कुमार पाठक
दृश्य 1: दादा जी की दालान
सुबह सवेरे सजी कचहरी, दादा जी की सुंदर दालान,
दिव्यांशु, प्रियांशु बैठे सुनने, खेती का सच्चा ज्ञान।
शशांक और अंशिका लाए, बस्ते और अपनी किताब,
पीहू भी दौड़ी-दौड़ी आई, करने खुशियों का हिसाब।
दृश्य 2: पाठशाला और ज्ञान
मम्मी-पापा हाथ पकड़कर, ले जाते है पाठशाला,
विद्या से ही मिटता जग में, अज्ञान का गहरा ताला।
पर दादा जी कहते बच्चों, मिट्टी भी बड़ी शिक्षक है,
जो मेहनत से अन्न उगाए, वही असली रक्षक है।
दृश्य 3: खेती की सैर
चलो चलें हम खेत की ओर, जहाँ खड़ा बैल और गाय,
पशु हमारे सच्चे साथी, इनका कर्ज चुकाया न जाए।
खेतों में है लहराती धान, गेहूँ और मकई की बाल,
इनसे ही बनती है रोटी, इनसे ही घर होता खुशहाल।
दृश्य 4: सब्जियों की बगिया
छोटू देखो क्या उगा है? बैगन, भिंडी और टमाटर,
मिट्टी के भीतर पलते हैं, गोल-गोल और लाल आलू।
खीरा सोता ठंडी बेल पर, कद्दू ने है फैलाई काया,
प्रकृति ने हम बच्चों पर, ममता का है हाथ फिराया।
दृश्य 5: फलों का उपहार
सेव, नारंगी और केला, सेहत का भंडार हैं ये,
डॉक्टर को जो दूर भगा दे, ऐसे मददगार हैं ये।
दादा जी की सीख यही है—मिलकर हम पेड़ लगाएँ,
हरियाली और खुशहाली से, सुंदर अपना देश बनाएँ।
सीख - "परिश्रम और प्रकृति ही हमारे सबसे बड़े शिक्षक हैं। 
अगर हम धरती का सम्मान करेंगे, 
तो धरती माँ हमें सेहत और समृद्धि का उपहार देगी।"

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