"सांझ की ढलती देह"
पंकज शर्मागुरूदेव की गीतांजलि की कविता संख्या 84 "शेष बेलाय" जिसका भाव कुछ इस प्रकार है.....
"खेला धुला शेष करे छाई,
अबे बेला होलो घोर फिरे जाइ।"
उसको आधार बनाकर हमने कुछ लिखने का प्रयास किया है।
. क्षितिज-तट पर
स्वर्ण-किरणें अब निस्तब्ध पड़ी हैं,
समय की संदूक में
स्मृतियाँ अश्रु-सी जड़ी हैं।
जहाँ कल तक कोलाहल था,
वहाँ मौन की चादर बिछी है,
बाज़ारों की जाग्रत रातें
संध्या में विलीन हुई हैं।
मन की वीथियों में सजी
स्वप्नों की हाट उजड़ चुकी,
अपनों के पदचिह्नों पर
धूल की परतें ठहरी हैं।
लाभ-हानि के लेखे
अब निष्प्राण पड़े हैं,
अहंकार का स्वर्ण-कलश
मध्य पथ में टूट गया है।
पाना और खोना दोनों
स्वप्नवत प्रतीत होते हैं,
मेला विलीन हो चुका—
अब केवल शांत मौन शेष है।
पंकज शर्मा (कमळ सनातनी)
ग्रेटर नोएडा (जी बी नगर)
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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