निर्लज्ज कैसे हो गए
--:भारतका एक ब्राह्मण.संजय कुमार मिश्र"अणु"
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चकित भयभीत हिरण सी सभा की ओर निहारी।
इतने निर्लज्ज कैसे हो गये हो हे वीर अवतारी।।
तेरे ही सामने है लूट रही तेरी विजीत नारी।
पितामह भीष्म को फिर देख वो नारी फुंफकारी।।
नराधम नीच दुश्शासन तेरा सब नाश बाकी है।
जो अबला समझ मुझको बना डाला तू झांकी है।।
द्रुपद की बालिका हूँ मैं,बहन हूँ गीरधारी का।
बचाने धर्म और लज्जा जरूर आयेगें नारी का।।
हे नाथ!हे यदुनाथ!!बचाओ लाज तुम मेरी।
लगाकर ध्यान!हे भगवान!!फिर द्रौपदी टेरी।।
द्रुपदा की लाज बचाने झपट आये थे मुरारी।
करूण पूकार कर स्वीकार बने सारी थे बिहारी।।
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वलिदाद,अरवल (बिहार)८०४४०२.संपर्क -- ८३४०७८१२१७.
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