अनमोल रिश्ता
संजय जैनजग को जीत लिया हमनें
मन को जीत नही पायें।
दिल देकर हम अपना
मन हल्का न कर पायें।
रीत-रिवाजों के चक्कर में
पड़कर खुदको फसा लिया।
अपनी जिंदगी को हमनें
नरक जैसा बना लिया।।
जग को जीत लिया..।।
दिलका हाल सुनकर हमनें
अपनों को रुला दिया।
दिलकी अपनी पीड़ा को
कहकर उन्हें बता दिया।
आज मिला मौका मुझको
तो दिल अपना लूटा दिया।
करते प्यार मोहब्बत जिससे
उसको प्यारा संदेश दिया।।
जग को जीत लिया...।।
बचपन बीता साथ खेलने में
जियें जवानी भी साथ में।
दुख-दर्द अपना साथ में बाँटा
पर दिलको पढ़ पाया नही।
इसी बात का मलाल हो रहा
समझ नही पायें हम क्यों।
एक-दूसरे से जुदा होकर
मित्रता रखते अब भी हम।।
जग को जीत लिया हमनें
मन को जीत नही पायें..।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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