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नयन से नयन मिले, जलज खिले अनुराग के

जब नयनों में प्रेम उतरता है,तो शब्द नहीं, भाव बोलने लगते हैं।प्रीति की मधुर तरंगों में भीगकर जन्म लेती हैं ऐसी ही अनुभूतियाँ…

नयन से नयन मिले, जलज खिले अनुराग के

कुमार महेंद्र
नयन से नयन जो मिले प्रिये,
मधुर हुए सब भाव।
हृदय-तरंगिणी प्रीति-सुधा में,
बहने लगे स्वप्निल चाव।
लाँघ लजाती चंचल देहरी,
महके पल मधु-पराग के।
नयन से नयन मिले, जलज खिले अनुराग के।।


अधरों पर मधुमास उतर आया,
साँसों में मृदु संगीत।
स्पर्श-सुगंधित पावन क्षण में,
झंकृत हुआ मन-गीत।
चाँद-सितारे साक्षी बन बैठे,
मिलन सजे सुहाग के।
नयन से नयन मिले, जलज खिले अनुराग के।।


कुंतल छाया चंद्र-किरण सी,
मुख पर अरुणिम लाली।
मंद पवन संग थिरक उठी फिर,
प्रीति-भाव की डाली।
कंगन-पायल गुनगुन बोले,
रंग खिले प्रणय-राग के।
नयन से नयन मिले, जलज खिले अनुराग के।।


मन से मन का सेतु बँध गया,
मिटे विरह के शूल।
आलिंगन में सिमट गई फिर,
पलकों की हर भूल।
सपनों ने आकार लिया जब,
दीप जले मधुरिम फाग के।
नयन से नयन मिले, जलज खिले अनुराग के।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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