।।“हरित स्वप्न की सांझ”।।
रचना -डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"हरियाली की चिता जलाकर,
क्यों करता तू उजियारा?
पूछ रहा है सहमा बचपन-
कहाँ गया वन उपवन सारा?
बंद 1
किस अंजलि से झर गए वन,
किस उर से हरित स्पंदन खोया?
निशि के निस्तब्ध कुंजों में
किसने मौन विलाप संजोया?
बंद 2
सूने तरु की शुष्क भुजाएँ
किसे बुलाएँ, किसे पुकारें?
विहग-विहीन नभ की आँखें
किस छाया में अश्रु उतारें?
बंद 3
धरती के प्यासे अधरों पर
किस पीड़ा की रेखा फूटी?
मेघों की चंचल स्मृति भी
आज क्यों बन गई है रूठी?
बंद 4
स्वप्निल नयनों में बालक के
हरियाली का चित्र अधूरा,
पूछ रहा विस्मित उर से-
था क्या सच में वन यह सारा?
बंद 5
तप्त दिवस की उष्ण श्वास में
क्यों ज्वाला का स्पर्श समाया?
किस अपराध-बोध से व्याकुल
मानव ने यह दाह रचाया?
बंद 6
धूल-धूसरित पथ की वीणा
किस विरह-राग में है टूटी?
विकास-ज्योति की छाया मेंकिस जीवन-लौ चुपके छूटी?
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