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संविधान, लोकतंत्र और सत्ता संघर्ष - राज्यपाल बनाम निर्वाचित सरकार

संविधान, लोकतंत्र और सत्ता संघर्ष - राज्यपाल बनाम निर्वाचित सरकार


दिव्य रश्मि के उपसंपादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सत्ता जनता के मत से तय होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और वही प्रतिनिधि सरकार बनाते हैं। लेकिन कई बार ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, जब किसी राज्य में सरकार गठन को लेकर विवाद पैदा हो जाता है। ऐसे समय में राज्यपाल की भूमिका अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाती है।


हाल के वर्षों में कई राज्यों में यह प्रश्न बार-बार उठा है कि क्या राज्यपाल संविधान के संरक्षक हैं या फिर केंद्र सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि? जब राज्यपाल यह कहते हैं कि पहले समर्थन-पत्र पेश कीजिए, तभी सरकार गठन पर निर्णय होगा, तब एक वर्ग इसे संवैधानिक दायित्व मानता है, जबकि दूसरा वर्ग इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप बताता है।


यह बहस केवल किसी एक राज्य या दल की नहीं है। यह भारतीय संघीय ढांचे, संविधान की आत्मा और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा अत्यंत गंभीर प्रश्न है। एक तरफ राज्यपाल का संवैधानिक दायित्व है कि वह स्थिर सरकार सुनिश्चित करें, वहीं दूसरी ओर निर्वाचित सरकारों का यह आरोप भी लगातार सामने आता रहा है कि राज्यपाल केंद्र के “रबड़ स्टैंप” बनकर काम करते हैं।


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 से 162 तक राज्यपाल के पद, शक्तियों और दायित्वों का उल्लेख किया गया है। संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल को राज्य का संवैधानिक प्रमुख बनाया है, ठीक उसी तरह जैसे राष्ट्रपति केंद्र का संवैधानिक प्रमुख होता है। राज्यपाल का पद मूलतः तीन उद्देश्यों के लिए बनाया गया था। पहला राज्य में संवैधानिक व्यवस्था बनाए रखना। दूसरा केंद्र और राज्य के बीच सेतु का कार्य करना और तीसरा राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में तटस्थ निर्णय देना।


संविधान सभा में इस पद पर लंबी बहस हुई थी। कई सदस्यों को आशंका थी कि राज्यपाल केंद्र का एजेंट बन सकता है। इसलिए यह स्पष्ट किया गया कि राज्यपाल को दलगत राजनीति से ऊपर रहना होगा। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि राज्यपाल का पद केवल औपचारिक नहीं है, लेकिन वह समानांतर सत्ता केंद्र भी नहीं बन सकता। यही कारण है कि संविधान में वास्तविक कार्यपालिका शक्ति मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को दी गई।


यह प्रश्न आज सबसे अधिक चर्चा में रहता है। यदि राज्यपाल किसी दल या गठबंधन से समर्थन-पत्र मांगते हैं, तो क्या यह संविधान के खिलाफ है? संवैधानिक दृष्टि से इसका उत्तर “नहीं” है। जब किसी राज्य में स्पष्ट बहुमत नहीं होता है, तब राज्यपाल का दायित्व बनता है कि वह सुनिश्चित करें कि जिसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जा रहा है, उसके पास सदन का विश्वास प्राप्त करने की वास्तविक संभावना हो। ऐसी स्थिति में राज्यपाल किस दल के पास सबसे अधिक सीटें हैं। कौन-सा गठबंधन बहुमत के करीब है। क्या समर्थन देने वाले दलों ने लिखित समर्थन दिया है। क्या स्थिर सरकार बनने की संभावना है। इन सभी मुद्दों को देख सकते हैं। इसलिए समर्थन-पत्र मांगना अपने आप में असांविधानिक नहीं माना जा सकता है। बल्कि कई मामलों में यह संवैधानिक सतर्कता का हिस्सा माना जाता है। लेकिन विवाद तब पैदा होता है, जब राज्यपाल का निर्णय निष्पक्ष न लगे या राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगे।


भारतीय न्यायपालिका ने इस विषय पर कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय बार-बार यह स्पष्ट कर चुका है कि बहुमत साबित करने का सबसे उचित मंच विधानसभा है, न कि राजभवन।


एस.आर. बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया भारतीय संघवाद और लोकतंत्र से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला माना जाता है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर होना चाहिए। राज्यपाल की रिपोर्ट अंतिम सत्य नहीं मानी जा सकती है। लोकतांत्रिक सरकार को मनमाने तरीके से हटाया नहीं जा सकता है। यह फैसला संघीय ढांचे की रक्षा के लिए मील का पत्थर माना जाता है।


संविधान सभा में कई सदस्यों ने चिंता व्यक्त की थी कि यदि राज्यपाल को अत्यधिक शक्तियां दी गईं, तो वह निर्वाचित सरकार के समानांतर शक्ति केंद्र बन सकते हैं। इसलिए स्पष्ट किया गया है कि वास्तविक सत्ता मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास होगी। राज्यपाल सामान्य परिस्थितियों में मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करेंगे। राज्यपाल का विवेकाधिकार सीमित परिस्थितियों तक ही रहेगा। यही कारण है कि संविधान सभा में कहा गया कि राज्य में सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते हैं। यदि राज्यपाल बार-बार निर्वाचित सरकार के निर्णयों में हस्तक्षेप करें, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ सकता है।


भारत के राजनीतिक इतिहास में अनेक अवसर ऐसे आए हैं, जब राज्यपाल की निष्पक्षता पर सवाल उठे। कई राज्यों में देखा गया कि सबसे बड़े दल को आमंत्रित नहीं किया गया। रातों-रात शपथ ग्रहण कराया गया। बहुमत परीक्षण में देरी की गई। विपक्ष को सरकार बनाने का मौका नहीं मिला। इन घटनाओं ने यह धारणा मजबूत की कि कुछ राज्यपाल केंद्र सरकार के राजनीतिक हितों के अनुसार कार्य करते हैं।


राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है, लेकिन व्यवहारिक रूप से केंद्र सरकार ही नाम तय करती है। अधिकतर मामलों में पूर्व राजनेता, सेवानिवृत्त नौकरशाह या राजनीतिक रूप से निकट व्यक्ति राज्यपाल बनाए जाते हैं। यहीं से विवाद शुरू होता है। जब राज्यपाल विपक्ष शासित राज्यों से टकराव करें। विधेयकों को लंबे समय तक रोके। सरकार गठन में विवादित भूमिका निभाएं। बार-बार केंद्र समर्थक रुख अपनाएं, तो उन पर “रबड़ स्टैंप” होने का आरोप लगता है।


हाल के वर्षों में कई राज्यों में राज्यपाल और सरकार के बीच संघर्ष देखने को मिला है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली (हालांकि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है), इन राज्यों में विश्वविद्यालय नियुक्तियों, विधेयकों, विधानसभा सत्र बुलाने और सरकार गठन को लेकर लगातार विवाद हुए हैं।


2019 महाराष्ट्र गवर्नमेंट फॉर्मेशन क्राइसिस भारतीय राजनीति का एक बड़ा उदाहरण बन गया है। रातों-रात राष्ट्रपति शासन हटाया गया और सुबह सरकार गठन की प्रक्रिया पूरी हुई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया। इस घटना ने यह सवाल उठाया कि क्या राज्यपाल राजनीतिक घटनाक्रम में निष्पक्ष बने रहे?


2018 कर्नाटक गवर्नमेंट फॉर्मेशन क्राइसिस और गोवा में भी सरकार गठन को लेकर विवाद हुआ। कई बार सबसे बड़े दल को आमंत्रित करने की बजाय गठबंधन को प्राथमिकता दी गई। कहीं बहुमत परीक्षण के लिए लंबा समय दिया गया, तो कहीं तुरंत फ्लोर टेस्ट कराया गया। इन अलग-अलग मानकों ने राज्यपाल की भूमिका को विवादास्पद बना दिया है।


कई संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्यपाल के विवेकाधिकार की स्पष्ट सीमाएं तय होनी चाहिए। इसके पक्ष में तर्क है राजनीतिक दुरुपयोग रुकेगा। सरकार गठन प्रक्रिया पारदर्शी होगी। संघीय ढांचे को मजबूती मिलेगी और न्यायपालिका पर बोझ कम होगा। वहीं विरोध में तर्क है कि हर राजनीतिक परिस्थिति अलग होती है। राज्यपाल को कुछ लचीलापन जरूरी है। संवैधानिक संकट में तत्काल निर्णय लेने पड़ते हैं।


राज्यपाल की भूमिका को लेकर गठित आयोगों ने कई सुझाव दिए। सरकारिया कमीशन- इस आयोग ने कहा है कि राज्यपाल गैर-राजनीतिक व्यक्ति होना चाहिए। नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श होना चाहिए। राज्यपाल केंद्र का एजेंट नहीं होना चाहिए। वहीं पूंछी कमीशन (Punchhi Commission)- इस आयोग ने सुझाव दिया है कि राज्यपाल की शक्तियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए। विवेकाधिकार के दुरुपयोग पर रोक लगे। सरकार गठन की प्रक्रिया के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश हो।


असल समस्या यह है कि दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों में सही दिखाई देते हैं। राज्यपाल कहते हैं कि उन्हें स्थिर सरकार सुनिश्चित करनी है। बिना पर्याप्त समर्थन के सरकार गठन लोकतंत्र के लिए खतरा हो सकता है। समर्थन-पत्र मांगना संवैधानिक जिम्मेदारी है। वहीं सरकारें कहती हैं कि बहुमत का परीक्षण सदन में होना चाहिए। राज्यपाल को राजनीतिक पक्षपात नहीं करना चाहिए। जनता के जनादेश का सम्मान जरूरी है। यही टकराव संवैधानिक बहस को जन्म देता है।


भारत सहकारी संघवाद की अवधारणा पर आधारित देश है। यदि राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच लगातार टकराव होता रहेगा, तो इसका असर पूरे संघीय ढांचे पर पड़ेगा। इसके परिणाम होंगे राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता, केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव, शासन व्यवस्था पर असर और जनता के विश्वास में कमी।


आज लगभग हर बड़े राजनीतिक विवाद में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है। यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है कि क्या राजनीतिक संस्थाएं अपना दायित्व निभाने में असफल हो रही हैं? क्या राज्यपाल की भूमिका अत्यधिक विवादित हो चुकी है? क्या संवैधानिक मर्यादाओं का पालन नहीं हो रहा है?


कुछ राजनीतिक दलों ने राज्यपाल पद समाप्त करने तक की मांग उठाई है। उनका तर्क है कि यह औपनिवेशिक व्यवस्था की विरासत है। राज्यपाल लोकतांत्रिक जनादेश के बिना शक्तिशाली पद पर बैठते हैं। इस पद का राजनीतिक दुरुपयोग होता है। लेकिन दूसरी ओर कई विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्यपाल संवैधानिक संतुलन बनाए रखते हैं। संकट की स्थिति में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। संघीय ढांचे में यह पद जरूरी है।


राज्यपाल से जुड़े विवादों को कम करने के लिए कई उपाय सुझाए जाते हैं कि मुख्यमंत्री और विपक्ष से परामर्श लेकर नियुक्ति हो। सक्रिय राजनीति से जुड़े लोगों की नियुक्ति कम हो। विधेयकों और सरकार गठन पर अनावश्यक देरी न हो। बहुमत विवाद की स्थिति में तुरंत विधानसभा परीक्षण हो। राज्यपाल की भूमिका स्पष्ट और सीमित रहे।


भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि यहां संस्थाओं के बीच संतुलन बना रहे। राज्यपाल का पद संविधान की महत्वपूर्ण संस्था है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब वह पूर्ण निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा के साथ कार्य करे। समर्थन-पत्र मांगना अपने आप में असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि राज्यपाल का दायित्व स्थिर सरकार सुनिश्चित करना है। लेकिन यदि यह प्रक्रिया राजनीतिक पक्षपात से प्रभावित दिखे, तो लोकतंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है।


सर्वोच्च न्यायालय बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि असली बहुमत का फैसला विधानसभा में होना चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है। संविधान सभा ने भी स्पष्ट कहा था कि राज्य में सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते। इसलिए राज्यपाल को संवैधानिक प्रमुख की भूमिका तक सीमित रहना चाहिए, न कि सक्रिय राजनीतिक खिलाड़ी की तरह व्यवहार करना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि संवैधानिक संस्थाएं अपनी सीमाओं का सम्मान करें। राज्यपाल यदि निष्पक्ष रहें, निर्वाचित सरकारें संविधान का पालन करें और न्यायपालिका लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करती रहे, तभी संघवाद और लोकतंत्र दोनों सुरक्षित रह पाएंगे। -------------
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