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ज्येष्ठ मास महात्मय {आठवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {आठवां अध्याय}

आनन्द हठीला
स्कन्दजी बोले कि प्रथम पर्वतों के स्वामी हिमत्रान् भूधर नाम से विख्यात था और वह स्वेच्छा से स्थावर तथा जङ्गम दोनों रूप को धारण करता था ॥ १ ॥

शोभन अङ्गवाली उसकी स्त्री का मेनका नाम था । हिमवान् (भूधर) सर्व सिद्धियों से युक्त होने पर सन्तानहीन होने के कारण अत्यन्त दुखी था ॥ २ ॥

और सन्तति के लिये व्रत दानों को भी किया परन्तु सन्तति न मिली। एक दिन हिमवान् ने अपनी स्त्री मेना को बुलाकर 'धिक्कार है कहकर बारम्बार प्रलाप करने लगा ॥ ३ ॥

और बोला कि जो रूप लावण्य से युक्त स्त्री सन्तान से हीन हो वह ' खी समस्त लोकों में निन्दित और दुर्भगा है ॥ ४ ॥

हे शुचिस्मिते ! तुमको देखकर सदा मुझे अधिक समय तक सन्ताप होता रहता है इसलिये अबसे लेकर तुम्हारा मुख न देखेंगे ।। ५ ।।


विपश्चित् (विद्वान्) पशुओं के समान प्राणों को तू कैसे धारण करती है। यह पति के वचन को सुनकर वायु के आघात से रम्भा (केला) के समान ॥ ६ ॥


और वजू के आघात से पर्वत के समान मेनका पृथिवी पर गिर गई। तथा रोदन कन्दन करती हुई श्री विष्णु भगवान् के शरण में गई ॥ ७ ॥


रमा (लक्ष्मी) जी के प्रार्थना करने पर और सामने नारद ऋषि को देखकर विष्णु भगवान् ने नारद जी को मेनका के पास भेजा ॥ ८ ॥


नारद जी ने वहाँ जाकर पर्णाशन व्रत का उपदेश दिया और कहा कि ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया के दिन विधान से व्रत को करो ॥९॥


मेनका उपदेश होनेपर जिसे मनुष्यों ने कभी नहीं देखा था ऐसे पर्वत की गुफा में गई। जो कि सिंह व्याघ्रगणों से व्याप्त है और झिल्लियों से युक्त हैं ॥ १० ॥


वह पतिव्रता वहाँ जाकर स्थाणु के समान नियम में स्थित हो गई। न भोजन न निद्रा न अन्य कर्म को ही करती है ॥ ११ ॥


केवल श्री विष्णु भगवान् की गुणमयी मानसी माया का सदा स्मरण करती थी। यह सब दुष्कर कर्म दैवयोग से ज्येष्ठ मास में हुआ ॥ १२ ॥


उस व्रत के पुण्यप्रभाव से जगन्मयी माया प्रकट हो गई। उस माया को देखकर मेना ने परमभक्ति से स्तुति किया, तब माया ने उस मेनका से कहा कि तू वर मॉग ।। १३ ।।


तुम्हारे मासोपवास व्रत से मै प्रसन्न हूँ, तुम्हारी भक्ति के वशीभूत होकर अदेय (न देने योग्य) बस्तु को भी दूंगी ॥ १४ ॥


यह जगदम्बा के वचन सुनकर मेनका बोली और प्रसन्न भो हुई। मेनका बोली कि हे देवेशि! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे आँगन में आप कन्या होकर रहे ॥ १५ ॥


जगदम्बा ने कहा कि 'मैं कन्या होऊंगी' ऐसा वर देकर फिर कहा कि तुमको एक पुत्र भी होगा । हे मेनके ! तुमसे एक हित की बात कहती हूँ सो तुम मेरी आज्ञा से करो ॥ १६ ॥


तुमको अनायास से ही ज्येष्ठ का माहात्म्य मिल गया। तुम अपने घर को जाओ और इसको यत्न से विधिपूर्वक करो ॥ १७ ॥


इस व्रत का विधान भृगु ऋषि आज आकर तुमसे कहेंगे। ऐसा कहकर माया अन्तर्हित हो गई और मेनका भी अपने गृह को गई ॥ १८ ॥


घर जाकर मेनका ने हिमाचल से सब समाचार बिस्तार से कहा और भृगु ऋषि के उपदिष्ट मार्ग से उस व्रत को मेनका ने भी किया ॥ १६ ॥


इस समाचार को जानकर हिमवान् भी प्रसन्नता और हर्ष के साथ दोनों हाथों से मेना का आलिङ्गन कर अपने गोद में बैठाकर समझाने लगा ॥ २० ॥


इसके अनन्तर कुछ दिन बीतने पर मेना गर्भवती हो गई और वसिष्ठ ऋषि ने आकर मेना का पु'सवन क्रिया को ॥ २१ ॥


किया, हिमाचल के समान मनुष्य पृथिवी पर दुर्लभ होते है, जिस हिमवान् के सामने अपनी इच्छा से जगद्धात्री माया प्रकट हो गई ।।२२।।


और उमा गौरी पार्वती नाम से विख्यात हुई। इस तरह ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन शिवा प्रकट हुई हैं ॥ २३ ॥


इसलिये सौभाग्य की वृद्धि के लिये स्त्रियों चतुर्थी के दिन शिवा का पूजन करें। मिट्टी का शिव बनाकर मण्डप चार द्वार से शोभित करे ॥ २४ ॥


गिरिजासन के चारो तरफ धान्य को बिछाकर मध्यभाग में अपनी शक्ति के अनुसार रजत (चॉदी) आदि का आन्दोलन (भूला) स्थापित करे ॥ २५॥


उमा की सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर सुन्दर भूला में स्थापित करे और विभव के अनुसार भक्ति से विधिवत् पूजन करे ॥ २६ ॥


तथा सुवासिनी (सोहागिन ) ब्राह्मणियों की पूजा करें और कुमारिका (कन्याओं) को भोजन करावे। तथा अनेक सौभाग्य द्रव्य, माला, चन्दन से पूजन कर ॥ २७ ॥


गीत (गाना) वादित्र (वाद्य) के निर्घोप आदि के द्वारा मास व्यतीत करे । नित्य हविष्यान्न का भोजन करे और यत्नपूर्वक नित्य कथा का श्रवण करे ॥ २८ ॥


बाद फलसम्पत्ति के लिये उद्यापन को करे और गौरीर्मिमाय मन्त्र पढ़कर पय (पायस) से हवन करे ।। २९ ।।


समस्त पूजन हवन कार्य को कर दूध देनेवाली गौ का दान करे। यह स्त्रियो के लिये सौभाग्यदायक गौरीव्रत प्रसिद्ध है ॥ ३० ॥


जो स्त्री मोहवश चतुर्थी के दिन भोजन करती है वह जन्म जन्म (प्रतिजन्म) मे दुर्भगा होती है ॥ ३१ ॥


उस दिन से इस व्रत की जगतीतल मे उमा-जयन्ती नाम से प्रसिद्धि हुई। मेनका ने पुत्र सन्तान के निमित्त पुनः इस व्रत को किया ॥ ३२ ॥


और इस व्रत के प्रभाव से महान् ओजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ, वह मैनाक नाम से दूसरा हिमाचल कहा जाता था ॥ ३३


इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' १० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥


क्रमशः...
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