घर में छिपे साँप बिच्छुओं को, हमको निपटाना होगा,
सीमा पर सैनिक तैनात, भीतर सबको टकराना होगा।नहीं बचेगा कोई दुश्मन, अगर ठान लें सब मिलकर,
संरक्षण में पलने वालों का, कब्र नया ठिकाना होगा।
संरक्षक भी नहीं बचेंगे, सब पर निगाह हमारी हो,
ताक़तवर चाहे जितना भी, निपटाने की तैयारी हो।
कहीं छिपे हों किसी भेष, सबको बाहर निकालेंगे,
मुल्ला मौलवी बन कर बैठे, चाहे भेष एैय्यारी हो।
कुछ नेताओं का भेष बदल कर, जनता को भड़काते,
कुछ सत्ता की खातिर मिलकर, हिन्दू मुस्लिम लड़वाते।
कुछ दुश्मन से रिश्तेदारी कर, घर के भेद उजागर करते,
कुछ ग़द्दारों की मुखबिरी कर, अपने नागरिक मरवाते।
ढूँढ ढूँढकर गद्दारों को, बिल से बाहर निकालना होगा,
कुछ को सीमा से बाहर, कुछ भीतर ही निपटाना होगा।
सेना पुलिस और प्रशासन में, जितने भी ग़द्दार छिपे हों,
सबसे पहले उन्हें ढूँढ कर, उनको सबक सिखाना होगा।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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