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तुम्हें देख पुष्पित मन अरविंद

तुम्हें देख पुष्पित मन अरविंद

कुमार महेंद्र
मधुर मुस्कान, स्नेहिल चितवन और प्रेमिल स्पर्श ने मेरे सूने जीवन को मानो पुष्पित अरविंद बना दिया।
यह कविता उसी आत्मिक अनुराग, मधुर मिलन और अनंत प्रेम-सुगंध की भावाभिव्यक्ति है…“तुम्हें देख पुष्पित मन अरविंद”
— प्रेम के मकरंद से महकती एक प्रणय रचना

पाकर तुम्हारा साथ,
जीवन-अंतर प्रसून खिला।
सूनी पड़ी डगरों पर,
मंगलमय मधु-शकुन मिला।
जले नव आशा-दीप,
महका उर प्रणय-मकरंद।
तुम्हें देख पुष्पित मन अरविंद।।


मेरा जीवन तो जैसे,
तपता हुआ मरुस्थान था।
कदम-कदम पर मानो,
संघर्षों का तूफान था।
अधरों पर मुस्कान सजी,
निहार माधुर्य मुखारविंद।
तुम्हें देख पुष्पित मन अरविंद।।


मृदुल हृदय-कैनवास पर,
तुमने प्रणय-चित्र उकेरा।
विचलित पथ-पगडंडियों पर,
स्नेहिल स्पर्शों से किया सवेरा।
हर कर कष्ट, पीड़ा, नैराश्य,
भर दिया सुख-आनंद अखंड।
तुम्हें देख पुष्पित मन अरविंद।।


मधुर मिलन की बेला में,
मन वीणा झंकृत होती है।
तेरी चंचल चितवन पाकर,
हर धड़कन गीत संजोती है।
हिय-कामनाएँ हुईं सुवासित,
पाकर नेह-सुधा मिलिंद।
तुम्हें देख पुष्पित मन अरविंद।।


उत्साह-उमंग अनुपम,
जीवन की मधुर परिभाषा हो।
मृदुल प्रीत-अनुबंधों में,
मिलन-स्वप्न की अभिलाषा हो।
जनम-जनम तक साथ रहे,
अविरल प्रेम-सुगंध।
तुम्हें देख पुष्पित मन अरविंद।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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