तुम नेह की मृदुल अनुभूति हो
कुमार महेंद्र
प्रेम केवल स्पर्श का विषय नहीं,
वह आत्मा में उतरने वाली एक मृदुल अनुभूति है…
जो दूर रहकर भी हर पल साथ रहती है,
स्मृतियों में मुस्कुराती है,
और अंतर्मन को सौम्य उजास से भर देती है। ✨💖
“तुम नेह की मृदुल अनुभूति हो…”
मेरी नवीन स्वरचित रचना आपके समक्ष।
एक सुंदर सा अहसास,
हर पल कारक उजास ।
सब अच्छा लगने लगता,
दूर हो या फिर पास ।
अंतर्मन अनुपम श्रृंगार कर,
सहर्ष आत्मसात विभूति हो।
तुम नेह की मृदुल अनुभूति हो।।
दिव्य भव्य मोहक छवि,
अंतःकरण-बिंदु वसित ।
निशि-दिन प्रति पल उर में,
मधुर स्मृतियाँ रचित ।
हाव-भाव उत्संग तरंग,
रग-रग उन्मुख मिलन-रुचि हो।
तुम नेह की मृदुल अनुभूति हो।।
प्रिय-साक्षात्कार अभिलाषा,
हरदम छाई रहती ।
सृष्टि-दृष्टि आंतरिक पटल,
तुम्हारी परछाई रहती ।
हृदय-बिंदु अपनत्व-सरोवर,
जीवन-रंग सौम्य भवभूति हो।
तुम नेह की मृदुल अनुभूति हो।।
प्रणय-पथ पथिक आह्लाद,
सर्वदा अनुपम विशेष ।
विचरण आनंद-महासागर,
कष्ट नगण्य सुख-अधिशेष ।
तज नैराश्य बन मस्त मलंग,
अति पुलकित जीवन-संपूर्ति हो ।
तुम नेह की मृदुल अनुभूति हो।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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