ज्येष्ठ मास महात्मय {सप्तम अध्याय}
आनन्द हठीला
ऋपि लोग बोले कि हे स्कन्द जी ! पुनः कल्याणकारी ज्येष्ठ मास का माहात्म्य हम लोगों से कहिये। जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है. ।॥ १ ॥
स्कन्द जी बोले इस मास में विष्णु भगवान् उपवास करने से प्रसन्न होते है, इसलिये उपवास व्रत को करे। क्योंकि मासोपवास व्रत एक लाख उपवास के समान होता है ॥ २ ॥
एक मास पर्यन्त उपवास करना, प्रातःकाल स्नान करना, जितेन्द्रिय रहना, अथवा कन्द मूल फल खाकर रहना, पृथिवी पर शयन करना और मत्सरता (दूसरे का बुरा शोचना) से रहित रहना ॥ ३ ॥
नित्य शौच आचार से युक्त रहना, सत्य वचन बोलना और प्रसन्न रहना चाहिये । अथवा प्रतिपत् से लेकर कृष्णपक्ष की। त्रयोदशी पर्यन्त ।॥ ४ ॥
मद मोह तन्द्रा (आलस्य) का त्याग कर व्रत करना चाहिये। त्रयोदशी के दिन मङ्गल स्नान करे ।। ५ ।।
पूजा स्थान में बैठकर पुण्याहवाचन करे और देवताओं का अधिवासन कर सुवर्ण चाँदी तांबा अथवा मिट्टी का नूतन मजबूत ।। ६ ।।
घट स्थापित कर उसमे पञ्चरत्न छोड़कर घट के ऊपर विष्णु भगवान् को स्थापित करे, विष्णु की प्रतिमा शङ्ख चक्र गदा से युक्त हो । ७ ।।
सुवर्ण की हो और लक्ष्मी गरुड़ जी से युक्त हो । हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! अपने गृह्यसूत्र के अनुसार प्रथम ब्रह्मादि मण्डलदेवता को स्थापित करे ॥ ८ ॥
और चार द्वार से शोभित पुष्यों का मण्डप बनाना, केला के स्तम्भ से युक्त कर विविध प्रकार के तोरणों से युक्त करना ॥ ९ ॥
उस मण्डप के मध्य भाग मे विष्णु देव को स्थापित कर अनेक उपचारों से, पक्वान्न, पायस, खाड़, दहो मिला ओदन, (भात) ॥ १० ॥
ऋतुकाल के पुष्प, नारिकेल आदि फल, धूप, दीप, ताम्बूल और दिव्य सुगन्ध वस्तु से पूजन करे ।। ११ ।।
रात्रि में पुराण का श्रवण आदि के द्वारा जागरण करे, और हरिभक्ति के जानकार लोगों से कोर्तन करावे ॥१२॥
गीत (गान) वादित्र (वाद्य) के निर्घोष (आवाज) से महानिशा (अर्धरात्रि) का समय व्यतीत करे। प्रातःकाल होने पर नदी में स्नान करे ॥ १३ ॥
सब नित्य की विधि करके ब्राह्मणों के अनुमोदन करने पर पाँच ऋत्विजों का वरण करे और उनका वस्त्र भूपण से पूजन करे ॥१४॥
कुण्ड या स्थण्डिल (वेदी) में अग्नि का स्थापन कर अच्छी तरह हवन करे और पुरुषसूक्त के मन्त्रों से सोलह (१६) बार आहुति दे ॥ १५ ॥
शर्करा, खाड़, घृत, तिल, पायस की अष्टोत्तरशत (१०८) आहुति 'विष्णोनु केति' मन्त्र से देवे ॥ १६ ॥
बाद पूर्णाहुति हवन कर शेष इवन को समाप्त करे । ऋत्विजों को दक्षिणा देकर दूध देने वाली गौओं का दान करे ॥ १७॥
छत्र (छाता) जूता का दान करे और दश प्रकार के जो दान है उनको भी दे और अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन करावे तथा दक्षिणा देकर प्रसन्न करे ॥ १८ ॥ दो वस्त्रों से वेष्टित जो विष्णु की पूजित प्रतिमा है उसको अपने गुरु के लिये मन्त्र पढ़कर देवे । मन्त्र का अर्थ- केशव भगवान् इस प्रतिमा को ग्रहण करें और देनेवाले भी केशव भगवान् है, तथा देने और ग्रहण करने वाले दोनों के उद्धारकर्ता केशव भगवान् है, इसलिये केशव भगवान् को नमस्कार है। इस मन्त्र को पढ़कर दक्षिणा के साथ विष्णु की ॥ १६-२० ॥
प्रतिमा कुटुम्बी श्रोत्रिय श्रेष्ठ ब्राह्मण को देकर हे ब्राह्मण लोग ! वन्धुवर्ग के साथ बैठकर व्रत का पारण करे ॥ २१ ॥
जो लोग जगतीतल में इस दुर्लभ व्रत को करते है वे शोक मोद से छूटकर अवश्य वाञ्छित फल को पाते हैं ।॥ २२ ॥
इस व्रत को तेरह (१३) वर्ष पर्यन्त करके व्रत की सम्पूर्ण सिद्धि के लिये अति दुर्लभ उद्यापन को करे ॥ २३ ॥
प्रथम सपत्नीक तेरह (१३) ब्राह्मणों को निमन्त्रित करे उनका वस्त्र भूषण से पूजन करे और १३ गौ का दान करे ॥ २४ ।।
गौ वस्त्र भूपृण से भूषित हो, बछवा से युक्त हो, मांसल (मोटी तगड़ी) हो और बहुत दूध देनेवाली हो। गौयों के साथ यथाशक्ति दक्षिणा देकर अन्य ब्राह्मणों को भूयसी-दक्षिणा दे ॥ २५ ॥
अपने वित्त (धन) के अनुसार पूर्वोक्त हवनादि कर्म करे। श्रेष्ठ विष्णु के व्रत में वित्तशाठ्य (घन की शठता) न करे अथवा ॥ २६ ॥
यथाशक्ति जो कुछ किया जाता है वह सत्र सफल होता है। और जो दाम्भिक अथवा शठ है उसका समस्त किया हुआ कर्म निष्फल हो जाता है ॥ २७ ॥
इसलिये सभी उपायों से अपनी शक्ति के अनुसार विष्णु का पूजन करे ॥ २८ ॥
इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भव-व्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भाषाटीकायां सप्तमोऽध्यायः ।। ७ ।।
क्रमशः...
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