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मातृ संस्कृति: सभ्यता का उद्गम, ममत्व और वैश्विक वंदन

मातृ संस्कृति: सभ्यता का उद्गम, ममत्व और वैश्विक वंदन

सत्येन्द्र कुमार पाठक
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" -यह सूक्त मात्र एक पंक्ति नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व का बीज मंत्र है। वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक उद्घोष करता है कि माता और मातृभूमि का गौरव स्वर्ग की सुख-सुविधाओं से भी कहीं अधिक ऊंचा और पवित्र है। जब हम 'मातृ संस्कृति' (Mother Culture) की बात करते हैं, तो हम केवल एक पारिवारिक संरचना की नहीं, बल्कि उस वैश्विक चेतना की बात करते हैं जिसने आदि काल से मनुष्य को संस्कार, भाषा और करुणा के सूत्र में पिरोया है। आज जब विश्व २१वीं सदी की जटिलताओं से जूझ रहा है, तब मातृ संस्कृति के आदर्शों और मातृ दिवस जैसे वैश्विक उत्सवों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। प्रस्तुत आलेख में हम मातृ संस्कृति के दार्शनिक आधार, उसके ऐतिहासिक विकास और विश्व के विभिन्न कोनों में इसके उत्सव के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
: मानवीय सभ्यता की आधारशिला का सभ्यता के विकास क्रम में 'मातृ संस्कृति' वह व्यवस्था है जहाँ नारी या माता को समाज और परिवार के नैतिक और सांस्कृतिक केंद्र में रखा जाता है। यह संस्कृति 'अधिकार' से अधिक 'कर्तव्य' और 'शक्ति' से अधिक 'सहनशीलता' पर आधारित है। शक्ति की उपासना और नारीत्व का गौरव: प्राचीन भारतीय परंपरा में शक्ति को ही सृष्टि का मूल माना गया है। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:' के विचार ने समाज को यह सिखाया कि नारी का सम्मान ही प्रगति की पहली शर्त है। वेदों में प्रकृति को 'अदिति' कहा गया है, जो अनंतता और पोषण की देवी हैं। यही विचार आधुनिक युग में पर्यावरण संरक्षण के रूप में 'मदर अर्थ' या 'धरती माता' के संकल्प को पुष्ट करता है। संस्कारों की प्रथम पाठशाला में बच्चा अपनी पहली शिक्षा किसी औपचारिक विद्यालय में नहीं, बल्कि माता की गोद में प्राप्त करता है। भाषा, नैतिकता, सामाजिक बोध और आत्म-सम्मान जैसे गुण माता के माध्यम से ही संतति में प्रवाहित होते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, माँ का स्पर्श और उसकी लोरियाँ बालक के संज्ञानात्मक विकास की नींव रखती हैं।
मातृत्व को सम्मानित करने की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितना कि स्वयं मानव इतिहास। हालाँकि, इसके स्वरूप समय के साथ बदलते रहे हैं। प्राचीन यूनान (ग्रीस) में देवताओं की माता 'रिया' के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए वसंत उत्सव मनाए जाते थे। इसी प्रकार रोम में 'सिबेले' देवी की पूजा का प्रचलन था, जिन्हें 'मैग्ना मेटर' (महान माता) कहा जाता था। भारत में नवरात्रि का पर्व नौ दिनों तक शक्ति के विभिन्न रूपों की आराधना का प्रतीक रहा है, जो यह दर्शाता है कि यहाँ मातृत्व का अर्थ केवल जन्म देने तक सीमित नहीं, बल्कि दुष्टता के विनाश और सृजन के संरक्षण से भी है।
'मदरिंग संडे' की परंपरा १६वीं शताब्दी के दौरान ब्रिटेन और यूरोप के कुछ हिस्सों में 'मदरिंग संडे' मनाने की परंपरा शुरू हुई। लेंट (उपवास की अवधि) के चौथे रविवार को लोग अपने उस चर्च में जाते थे जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ था, जिसे 'मदर चर्च' कहा जाता था। धीरे-धीरे, सेवा करने वाले युवा इस दिन छुट्टी लेकर अपनी माताओं से मिलने जाने लगे, जिससे यह एक पारिवारिक मिलन के उत्सव में बदल गया।
आधुनिक 'मदर्स डे' की नींव अमेरिका में एना जार्विस द्वारा रखी गई। उनकी माता, एन रीव्स जार्विस, एक शांति कार्यकर्ता थीं जिन्होंने गृहयुद्ध के दौरान माताओं को एकजुट किया था। १९०५ में अपनी माँ के निधन के बाद, एना ने यह संकल्प लिया कि माताओं के बलिदानों को याद करने के लिए एक विशेष दिन होना चाहिए। १९०८ में ग्राफ्टन, वेस्ट वर्जीनिया में पहला आधिकारिक आयोजन हुआ और १९१४ में राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को 'मातृ दिवस' के रूप में राष्ट्रीय मान्यता दी। विश्व के लगभग हर कोने में मातृ दिवस मनाया जाता है, लेकिन इसके तौर-तरीके वहाँ की मिट्टी और संस्कृति की सुगंध लिए हुए हैं।
जापान: यहाँ मातृ दिवस को 'हाहा-नो-ही' (Haha no Hi) कहा जाता है। बच्चे अपनी माँ को लाल 'कार्नेशन' के फूल भेंट करते हैं, जो माँ के प्रेम की मिठास और शुद्धता का प्रतीक माने जाते हैं। स्कूलों में बच्चे माँ के चित्र बनाकर प्रदर्शनियां लगाते हैं।
मेक्सिको: यहाँ १० मई को बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोग अपनी माताओं को 'मारियाची' संगीत के साथ जगाते हैं। यह दिन मेक्सिकन समाज में इतना महत्वपूर्ण है कि इसे एक बड़े धार्मिक उत्सव की तरह मनाया जाता है। थाईलैंड: में मातृ दिवस १२ अगस्त को मनाया जाता है, जो वर्तमान रानी माँ सिरिकित का जन्मदिन भी है। इस दिन पूरे देश में आतिशबाजी होती है और लोग 'चमेली' के फूलों के हार अपनी माताओं को अर्पित करते हैं। इथियोपिया में 'अंत्रोश्त' (Antrosht) नामक उत्सव तीन दिनों तक चलता है। जब वर्षा ऋतु समाप्त होती है, तो परिवार के सदस्य पारंपरिक नृत्य और गीत-संगीत के साथ मिलकर 'हश' (Haash) नामक विशेष पकवान बनाते हैं और खुशियाँ मनाते हैं। नेपाल: यहाँ 'माता तीर्थ औंसी' के रूप में एक बहुत ही भावुक परंपरा प्रचलित है। लोग काठमांडू के पास माता तीर्थ कुंड में स्नान करते हैं और अपनी जीवित या दिवंगत माताओं के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
मातृ संस्कृति हमें 'स्व' से 'पर' की ओर ले जाती है। एक माँ का जीवन नि:स्वार्थ सेवा का जीवंत उदाहरण है। भारतीय दर्शन के अनुसार, माता का स्थान पिता और गुरु से भी ऊपर है क्योंकि वह सृजन की प्राथमिक इकाई है।
आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ स्वार्थ की भावना प्रबल हो रही है, मातृ संस्कृति हमें त्याग और धैर्य का महत्व समझाती है। एक माँ केवल भोजन नहीं देती, बल्कि वह जीवन की प्रतिकूलताओं से लड़ने का साहस भी प्रदान करती है। मातृ संस्कृति मनुष्य को प्रकृति से जोड़ती है। जब हम धरती को 'माता' कहते हैं, तो हमारे मन में उसके शोषण के बजाय उसके पोषण का भाव जागृत होता है। यही कारण है कि प्राचीन जनजातीय संस्कृतियों में, जहाँ मातृ सत्ता प्रभावी थी । आधुनिकता की दौड़ में मातृ दिवस का 'मार्केटिंग' और 'उपभोक्तावाद' के जाल में फंसना एक चिंता का विषय है। कार्ड, फूलों और महंगे उपहारों के शोर में माँ के प्रति वह गहरा सम्मान कहीं दब न जाए, इसका ध्यान रखना आवश्यक है। मात्र एक दिन नहीं, पूरे जीवन का उत्सव: माँ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए एक दिन अपर्याप्त है। 'मातृ दिवस' एक प्रतीक है जो हमें हमारे मूल कर्तव्यों की याद दिलाता है। हमें वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या और एकल परिवारों में माताओं की उपेक्षा पर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है।
नारी घर और पेशेवर जगत के बीच संतुलन बना रही है। मातृ संस्कृति का विस्तार अब दफ्तरों और सामाजिक संस्थानों में भी होना चाहिए, जहाँ महिलाओं को उनके मातृत्व के कर्तव्यों के साथ-साथ उनके करियर के प्रति भी सहयोग मिले।
मातृ संस्कृति मानवता की वह संजीवनी है जो समाज को संवेदनहीन होने से बचाती है। "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" का संदेश आज के वैश्विक परिवेश में शांति, प्रेम और भाईचारे की स्थापना के लिए अनिवार्य है। चाहे वह अमेरिका की एना जार्विस हो या भारत की कोई ग्रामीण महिला, मातृत्व की भाषा एक ही है—प्रेम।
आने वाले वर्षों में, विशेषकर १० मई २०२६ और उसके बाद के समय में, जब तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे जीवन को अधिक यांत्रिक बना देगी, तब माँ की ममता की गर्माहट ही हमें 'मनुष्य' बनाए रखने में सहायक होगी। मातृ दिवस के इस उत्सव को केवल उपहारों तक सीमित न रखकर, हमें अपने जीवन के आचरण में उस 'मातृ संस्कृति' को उतारना होगा जो नि:स्वार्थ भाव से इस सृष्टि का कल्याण चाहती है। माँ वह आधार है, जिस पर भविष्य की इमारतों का निर्माण होता है। उसका वंदन ही वास्तव में मानवता का वंदन है।
संदर्भ: भारतीय संस्कृत वाङ्मय और नीतिशास्त्र। विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में मातृ वंदन की परंपराएँ (ऐतिहासिक दस्तावेज़)। आधुनिक मातृ दिवस का इतिहास: एना जार्विस और एन रीव्स जार्विस की जीवनी वैश्विक जनगणना और सांस्कृतिक उत्सवों का समाजशास्त्रीय अध्ययन।
कर पी अरवल बिहार ८०४४१९


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