मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग - 15 ख
मौलिक कर्तव्य और मनुस्मृति
डॉ राकेश कुमार आर्य
वास्तव में मनु महाराज ने मनुष्य को धर्म के प्रति कर्तव्यशील बनाने का विधान किया है। कहना चाहिए कि जिन मौलिक कर्तव्यों की भारत का संविधान घोषणा करता है, उनकी अपेक्षा मनु महाराज की वर्णों के बारे में दी गई व्यवस्था कहीं बहुत उत्तम है। इन कर्तव्य कर्मों का वर्णन करते हुए वह कहते हैं कि मनुष्य के कर्तव्य कर्म को ही उसका धर्म घोषित कर दिया जाए और वह अपने कर्तव्य कर्मों को अपना धर्म समझकर पालन करता चले। मनु महाराज ने प्रत्येक वर्ण के कर्तव्य कर्मों को जब स्पष्ट किया है तो भारतीय संविधान में उल्लेखित मौलिक कर्तव्यों से उनकी संख्या बहुत अधिक हो जाती है। इसके साथ ही साथ ये इतनी सुंदर व्यवस्था है कि यदि अपने कर्तव्य कर्मों का प्रत्येक वर्ण में रहने वाला व्यक्ति नियम से पालन करना आरंभ कर दे तो समाज और संसार में पूर्ण सुख शांति स्थापित हो सकती है।
मनु महाराज कहते हैं कि " जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वेद का स्वाध्याय छोड़कर केवल अन्य शास्त्रों में श्रम करता है, वह जीवित ही अपने वंश के सहित शीघ्र ही शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है, शुद्ध बन जाता है। "
स्वामी दयानंद जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास तीन में इस व्यवस्था संबंधी श्लोक का अर्थ करते हुए कहते हैं कि " जो वेद को न पढ़कर अन्यत्र श्रम किया करता है, वह अपने पुत्र पौत्र सहित शूद्र भाव को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।"
इसका अभिप्राय है कि मनु महाराज जी की दृष्टि में देश के प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य है कि वह वेद का स्वाध्याय प्रतिदिन अवश्य करे। आज के संविधान में कहीं पर भी यह नहीं लिखा है कि नागरिकों का मौलिक कर्तव्य होगा कि वह प्रतिदिन वेद का स्वाध्याय करे।
वेदाभ्यास परम तप
वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन्द्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ 141 ॥
महर्षि मनु देश के नागरिकों को उनके मौलिक कर्तव्य समझते हुए बताते हैं कि वेद अभ्यास ही परम तप है। जो व्यक्ति द्विजों में उत्तम बने रहने की भावना रखता है, उसके लिए महर्षि मनु कहते हैं कि " द्विजोत्तम अर्थात् द्विजों में उत्तम बने रहने का इच्छुक प्रत्येक जन कष्ट सहन करते हुए भी वेद के स्वाध्याय का निरन्तर अभ्यास करे, क्योंकि द्विज जनों का वेदाभ्यास करना ही इस संसार में परम तप कहा है" ॥ 141 ॥
स्वामी दयानंद जी इस श्लोक का अर्थ करते हुए कहते हैं कि - " द्विजोत्तम अर्थात् ब्राह्मण आदिकों में उत्तम सज्जन पुरुष सर्वकाल तपश्चर्या करता हुआ वेद का ही अभ्यास करे, जिस कारण ब्राह्मण वा बुद्धिमान् जन को वेदाभ्यास करना इस संसार में परम तप कहा है।" (सं०वि०, वेदारम्भ०)
महर्षि मनु की यह विधिक व्यवस्था इसलिए है कि संसार की गति को सद्गति में स्थापित रखने के लिए वेद की आज्ञा का पालन करना ही श्रेयस्कर है।
ब्राह्मण के लिए अवमान-सहन का निर्देश-
सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥ 137 ॥
महर्षि मनु की मान्यता है कि ब्राह्मण को अवमान सहन करने का अभ्यासी होना चाहिए। उसका धैर्य और मानसिक संतुलन समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण संदेश देता है। अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी जिसका धैर्य और संतुलन बना रहे, वही ब्राह्मण कहलाता है। उसको किसी भी प्रकार के मान सम्मान की अपेक्षा नहीं होती। ब्राह्मण वर्णस्थ व्यक्ति सदैव सम्मान-प्राप्ति से, लौकेषणा से ऐसे बचकर रहे जैसे कोई विष से दूर रहता है और सम्मान न प्राप्त करने की भावना अमृत-प्राप्ति की इच्छा के समान सदा रखे अर्थात् ब्राह्मण के लिए सम्मान विष के समान हानिकर है और सम्मान की इच्छा न करना अमृत के समान हितकारी है।
संविधान में लिखा जाना चाहिए था....
मनु की इस प्रकार की व्यवस्था को लोगों के धैर्य और संतुलन को मजबूत बनाने के दृष्टिकोण से संविधान में मौलिक कर्तव्य के रूप में स्थापित करना चाहिए था। लिखा जा सकता था कि विद्वान लोगों को लौकेषणा से बचकर धैर्य और संतुलन का परिचय देना चाहिए। क्योंकि उनके इस प्रकार के आचरण का अनुकरण समाज के अन्य लोग करते हैं।
स्वामी दयानंद जी महाराज का अर्थ--" संन्यासी जगत् के सम्मान से विष के तुल्य डरता रहे और अमृत के समान अपमान की चाहना करता रहे। क्योंकि जो अपमान से डरता और मान की इच्छा करता है, वह प्रशंसित होकर मिथ्यावादी और पतित हो जाता है। इसलिए चाहे निन्दा, चाहे
प्रशंसा, चाहे मान्य, चाहे अपमान, चाहे जीना, चाहे मृत्यु, चाहे हानि ,चाहे लाभ हो, चाहे कोई प्रीति करे, चाहे कोई वैर बांधे, चाहे अन्न,पान, वस्त्र ,उत्तम स्थान नहीं मिले, चाहे शीत , उष्ण कितना ही क्यों ना हो इत्यादि सबका सहन करे और अधर्म का खंडन तथा धर्म का मंडन सदा करता रहे इससे परे उत्तम धर्म दूसरा किसी को नहीं माने। " ( संस्कार विधि सन्यास प्रकरण)
दूसरों से द्रोह आदि का निषेध -
नारुंतुदः स्यादार्तोऽपि न परद्रोहकर्मधीः ।
ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ॥136 ॥
दूसरों से द्रोह करना पाप है। इससे समाज, राष्ट्र व संसार की हानि होती है। देश के नागरिकों के लिए एक और उत्तम मौलिक कर्तव्य की स्थापना करते हुए अथवा तत्संबंधी विधि स्थापित करते हुए महर्षि मनु कहते हैं कि " स्वयं दुःखी होता हुआ भी किसी दूसरे को पीड़ा न पहुंचावे न दूसरे के प्रति ईर्ष्या-द्वेष या बुरा करने की भावना मन में लाये। मनुष्य के जिस वचन के बोलने से कोई उद्विग्न हो, ऐसी उस लोक में अप्रशंसनीय वाणी को न बोले।"
मनुष्य को मनुष्य का मित्र बनाने के लिए अथवा मनुष्य के हृदय में मनुष्य मात्र और प्राणी मात्र के प्रति प्रेम का भाव भरने के लिए इससे उत्तम व्यवस्था कोई नहीं हो सकती। परंतु इसके लिए एक ही शर्त है कि प्रत्येक व्यक्ति को ही इस प्रकार की विधि का पालन करना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति से तो अपेक्षा की जाए कि वह इस प्रकार स्वयं दुखी होता हुआ भी किसी दूसरे को पीड़ा ना पहुंचाये। परंतु दूसरा निरंतर पीड़ा पहुंचाने का काम करता रहे। यदि ऐसी स्थिति कहीं बन रही है तो जो व्यक्ति निरंतर पीड़ा पहुंचाने का काम कर रहा है, उसके विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्यवाही भी होनी चाहिए।
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किंचित्समाचरेत् । तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र वाऽस्य रमेन्मनः ॥ 198 ॥
महर्षि मनु पर आरोप लगाया जाता है कि वह स्त्री और शूद्रों के विरोधी हैं, परन्तु इस श्लोक में मनु कह रहे हैं कि " यदि कोई स्त्री और शूद्र भी अपने से कोई श्रेष्ठ आचरण करें तो उनसे भी शिक्षा लेकर सभी मनुष्यों को उस पर आचरण करना चाहिए और जिस शास्त्रोक्त श्रेष्ठ कर्म में मनुष्य का मन रमे उस को करता रहे ।"
मनु की इस विधिक व्यवस्था से स्पष्ट होता है कि वह स्त्री और शूद्रों के गुणों के प्रशंसक हैं। मनुष्य मात्र के लिए अथवा अन्य वर्णों के लोगों के लिए वह स्पष्ट व्यवस्था दे रहे हैं कि यदि स्त्री और शूद्रों के पास भी अपने से कोई श्रेष्ठ आचरण है तो उसे ग्रहण करना चाहिए।
निम्नस्तर के व्यक्ति से भी ज्ञान-धर्म की प्राप्ति-
श्रद्धधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि ।
अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ 213॥
संसार का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसमें कोई गुण न हो और कोई भी व्यक्ति ऐसा भी नहीं है- जिसमें कोई अवगुण न हो। यह हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण का अंतर होता है कि हम व्यक्ति को या तो सर्वगुण संपन्न ही मान लेते हैं अथवा सर्व दुर्गुण संपन्न मान लेते हैं। यह दृष्टिकोण उचित नहीं है। हमें व्यक्ति के गुण और अवगुण दोनों पर दृष्टि रखनी चाहिए और यदि उसके भीतर कोई गुण है तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। जिस प्रकार पक्षी पता नहीं कहां-कहां से लाकर अपना घोंसला बनाता है, उसी प्रकार जहां- जहां से हमें उचित सामग्री अथवा ज्ञान आदि प्राप्त हो जाएं, वहीं - वहीं से निसंकोच ले लेना चाहिए। इतना ही नहीं, इसके उपरांत उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता भी ज्ञापित करनी चाहिए जिससे वह गुण लिया गया था।
" उत्तम विद्या प्राप्ति की श्रद्धा करता हुआ पुरुष अपने से न्यून वर्ण के व्यक्ति से भी विद्या ग्रहण कर ले, शूद्र वर्ण का व्यक्ति भी यदि किसी उत्तम धर्म का ज्ञाता या पालनकर्त्ता हो तो उससे भी धर्म ग्रहण करे, और निंद्यकुल में भी यदि उत्तम गुणवती कन्या हो तो उसको पत्नी के रूप में ग्रहण कर ले, यह नीति है ॥ 213 ॥ (सं०वि०, वेदारम्भ०)"
यह तो केवल बानगी के रूप में है
हम मनु जी की सारी बातों को यहां पर उल्लिखित नहीं कर सकते। उन्होंने जितना कहा है उसमें से बानगी के रूप में हमने यहां पर कुछ बातों को स्पष्ट किया है। यह भी इस दृष्टिकोण से स्पष्ट किया गया है कि हमारे संविधान में जहां मात्र 10 मूल कर्तव्य दिए गए हैं, वहीं महर्षि मनु हमारे लिए अनेक व्यवस्थाएं अपने श्लोकों के माध्यम से स्थापित कर रहे हैं और बता रहे हैं कि :-
एक पवित्र जीवन कैसे बन सकता है ?
राष्ट्र पवित्र कैसे बन सकता है ?
समाज पवित्र कैसे बन सकता है ?
अंत में समस्त संसार कैसे पवित्र बन सकता है ?
कैसे संसार के लोग पवित्र बना सकते हैं ?
कैसे उनका जीवन आदर्श जीवन बन सकता है ?
वह कौन से बिंदु होंगे जो हमें मानव से देवत्व की प्राप्ति करने में सहायक हो सकते हैं ?
वह कौन सी विचारधारा है जो हमको संसार में रहते हुए 'भूसुर ' की श्रेणी में ला सकती है ?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर महर्षि मनु ने धर्म की साधना के लिए मनुष्य के कर्तव्य कर्म स्थापित करके दे दिया है। धर्म की साधना को संविधान ने उपेक्षित किया है जबकि धर्म की साधना मनुष्य जीवन की साधना के लिए परम आवश्यक है।
जब मनुष्य के भीतर सम्मान प्राप्ति की इच्छा जागृत होती है , मान अपमान के द्वंद में वह फंसता है और अपमान करने वाले के प्रति हिंसक होता है तो हिंसक होने के उपरांत वह उस व्यक्ति को दंड भी देना चाहता है । कई बार ऐसा भी होता है कि जब वह किसी को दंड दे रहा होता है तो अपेक्षा से अधिक भी दंड दे देता है । इससे समाज का संतुलन बिगड़ता है। इसलिए महर्षि मनु ने व्यवस्था दी कि सम्मान प्राप्ति की इच्छा को जागृत मत होने दो। मन को मान और अपमान के द्वंद से बाहर निकालो । इससे अपमान करने वाले के प्रति आपके भाव उग्र नहीं होंगे। तब किसी को अपेक्षा से अधिक दण्ड देने की बात भी नहीं आएगी । अतः कुल मिलाकर व्यक्ति को आत्मसंयमित जीवन जीना चाहिए। इस जीवन साधना को एक मौलिक कर्तव्य के रूप में संविधान में स्थान मिलना ही चाहिए था। क्योंकि इस प्रकार की जीवन साधना से लोक साधना का और लोकतंत्र का सपना साकार हो सकता है।
हमारे संविधान में यदि वैदिक ज्ञान के अनुकूल और वैदिक सामाजिक व राजनीतिक अपेक्षाओं के अनुरूप मौलिक कर्तव्यों को स्थान दिया जाता तो कहीं अधिक अच्छा रहता।
मनु महाराज का धर्मशास्त्र इसीलिए कहीं अधिक श्रेयस्कर है कि वह वेद की आज्ञाओं का यथावत पालन करता है। वेद की आज्ञाओं के अनुकूल ही महर्षि मनु ने अपना सारा विधान तैयार किया है। उसके सभी प्राविधानों को वेद के अनुकूल बनाने का पूरा ध्यान रखा है। संसार भर के संविधानों के ज्ञाता इस बात के निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि संसार में आज जितने भी संविधान हैं, उन सबका आदि मूल संविधान मनुस्मृति है अर्थात उनके पास जितना भी कुछ मानव समाज और राजनीति के सिद्धांतों के अनुकूल है, वह सब मनुस्मृति से ही लिया गया है।
(लेखकडॉ राकेश कुमार आर्य की पुस्तक - मनुस्मृति और भारतीय संविधान से)
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