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सामाजिक चेतना एवं आत्ममंथन

सामाजिक चेतना एवं आत्ममंथन

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
मन के भीतर झाँक जरा तू,
कितना निर्मल पानी है।
दोष गिनाता जग का फिरता,
क्या खुद से अनजानी है?
अपनी-अपनी श्रेष्ठता का
ढोल सभी ने पीटा है,
अहंकार की ऊँची दीवारों
ने अपनापन छीना है।
शब्द बचे हैं केवल मुख पर,
मन में कहाँ कहानी है?
मन के भीतर झाँक जरा तू,
कितना निर्मल पानी है।
ज्ञान अगर व्यवहार न बदले,
व्यर्थ बड़ी विद्वत्ता है,
जिससे जन-मन टूट रहा हो,
वह कैसी महत्ता है?
जिस दीपक से और जलें दीप,
उसकी सही निशानी है।
मन के भीतर झाँक जरा तू,
कितना निर्मल पानी है।
जाति, समूह, सभा, मंचों में
गुट का जाल बिछाया क्यों?
अपने ही लोगों के पथ में
काँटों को फैलाया क्यों?
सेवा से बढ़कर दुनिया में
नहीं दूसरी दानी है।
मन के भीतर झाँक जरा तू,
कितना निर्मल पानी है।
जहाँ जरूरत, वहीं सहायता
यही मनुजता होती है,
पीड़ित के आँसू पोंछे जो,
वही श्रेष्ठता होती है।
जो झुककर औरों को उठाए,
वह सच्ची अगुवानी है।
मन के भीतर झाँक जरा तू,
कितना निर्मल पानी है।
परिवर्तन का मंत्र न बाहर,
अपने भीतर पलता है,
जब “मैं” टूट “हम” बन जाता,
तब समाज सँभलता है।
आत्म-अवलोकन ही मन की
सबसे सच्ची वाणी है।
मन के भीतर झाँक जरा तू,कितना निर्मल पानी है।
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