"यौवन : स्वप्न एवं सत्य का संगम"
पंकज शर्मा
यौवन जीवन की वह उषाकालीन वेला है, जहाँ मनुष्य अपने भीतर अनंत संभावनाओं का स्पंदन अनुभव करता है। यदि इस अवस्था में संपन्नता प्राप्त हो, तो वह केवल वैभव नहीं रहती, बल्कि स्वप्नों को दिशा देने वाली शक्ति बन जाती है। धन तब साधन बनकर सृजन, ज्ञान एवं कर्म के नए द्वार खोलता है। परंतु यौवन का वास्तविक तेज बाहरी ऐश्वर्य में नहीं, भीतर की जिजीविषा में निहित होता है। इसी भाव को संत कबीर ने कहा है—
“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।”
अर्थात् विजय का मूल स्रोत मनुष्य की अंतःशक्ति है।
किन्तु यौवन में अभाव भी किसी वरदान से कम नहीं। निर्धनता मनुष्य को संघर्ष का सौन्दर्य सिखाती है एवं आत्मा को धैर्य, करुणा तथा आत्मविश्वास का आकाश प्रदान करती है। अभावों की अग्नि में तपकर ही व्यक्तित्व कुंदन बनता है। महापुरुषों का जीवन इसका प्रमाण है कि विपत्तियाँ ही आत्मबल का निर्माण करती हैं। वस्तुतः यौवन वह ऋतु है, जहाँ संपन्नता स्वप्नों को उड़ान देती है एवं संघर्ष आत्मा को उसकी वास्तविक ऊँचाइयों से परिचित कराता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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