कभी-कभी प्रेम बड़ी बातों में नहीं,एक छोटी-सी मुस्कान,एक साथ खाई गई आइसक्रीम,और कुछ अनकहे पलों में खिल उठता है… “आइसक्रीम के संग, खिल रहे प्रणय के रंग”मेरी स्वरचित रचना प्रेम के उन्हीं मधुर, चंचल और मुस्कुराते क्षणों को समर्पित…
आइसक्रीम के संग, खिल रहे प्रणय के रंग
कुमार महेंद्रमंद-मंद मुस्कान घुली है,
गर्मी ने ली अंगड़ाई।
टेबल पर हम-तुम बैठे,
तभी कुल्फी मुस्कुराती आई।
चॉकलेट-कोन के बहाने देखो,
मन में जागी नव प्रीत उमंग।
आइसक्रीम के संग, खिल रहे प्रणय के रंग।।
तुमने चखी जो स्ट्रॉबेरी,
अरुणिम हुए कपोल प्रिये।
नयनों की मूक भाषा में,
जल उठे अनुराग-दिये।
चम्मच पर कोमल स्पर्श हुआ,
टूट गई मन की हर जंग।
आइसक्रीम के संग, खिल रहे प्रणय के रंग।।
पिघल रही वह कप में देखो,
और यहाँ पिघल रहे हम।
मंद हँसी की मृदु फुहारों से,
दूर हुए जीवन के ग़म।
नटखट तेरी भोली बातें,
छेड़ रही नव प्रीत तरंग।
आइसक्रीम के संग, खिल रहे प्रणय के रंग।।
छोड़ो अब यह संकोच प्रिये,
थोड़ा सा तुम भी मुस्काओ।
अपने कोमल कर-कमलों से,
थोड़ा मुझे भी खिलाओ।
दुनिया चाहे सोती रहे,
प्रेम हमारा रहे मस्त मलंग।
आइसक्रीम के संग, खिल रहे प्रणय के रंग।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)दिनांक : 26/05/2026
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