Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

“राहुल सांकृत्यायन की यात्रा साहित्य”

“राहुल सांकृत्यायन की यात्रा साहित्य”

शोध सार
महापंडित राहुल सांकृत्यायन का जन्म 9 अप्रैल 1893 को उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा नामक गाँव में उनके ननिहाल में हुआ था और मृत्यु 1963 ईस्वी में । इनका मूल नाम केदारनाथ पांडे था। ये हिंदी साहित्य के पितामह थे । इनको “हिन्दी यात्रा साहित्य” का जनक कहा जाता है। वे यात्रा को केवल घूमने का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान अर्जन, संस्कृति समझने और साहसिक अनुभव का माध्यम मानते थे। उन्होंने यात्रा को "घुमक्कड़ धर्म" की संज्ञा दी है । राहुल सांकृत्यायन की यात्रा वृतांत ग्रंथ जीवंत और यथार्थ रूप में स्थापित है। इसे पढ़ने पर पाठक को ऐसा महसूस होता है कि हम भी तिब्बत और रूस की सड़को पर यात्रा कर रहे है। उनके मन अदम्य जिज्ञासा और साहस था, उन्होंने अपना जान जोखिम में डालकर तिब्बत में दुर्गम स्थानों पर यात्राएँ की। इनका वृतांत सिर्फ मनोरंजन ही नहीं है, उसमे संस्कृति, इतिहास, भूगोल और भाषा का अनूठा मिश्रण दिखाई पड़ता है। उन्होंने अपनी यात्राएँ ज्यादातर पैदल और खच्चरों पर बैठ कर की। रास्ते में उन्होंने खतरनाक से भी खतरनाक जलवायु का सामना किया, परंतु यात्रा को बीच में रुकने ही नहीं दिये। मनुष्य का यही सिद्धांत होना चाहिए जो कार्य ठान लिए, उसे बिना पूरा किये नहीं छोड़ना चाहिए। राहुल सांकृत्यायन ने 20 से भी अधिक यात्रा वृतांत लिखा है, सभी जीवंत रूप में है क्योंकि यात्रा का चित्रण उन्होंने सजीव रूप में किया है।

मेरी लद्दाख यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा, तिब्बत में सवा वर्ष , रूस में पचीस मास, घुमक्कर शास्त्र, किन्नर देश में, लंका यात्रा, नेपाल यात्रा, मेरी यूरोप यात्रा, घुमक्कड़ स्वामी, मेरी जापान यात्रा, ईरान में पहली बार, कुमाऊँ जौनसार, देहरादून यात्रा, दर्जिलिंग परिचय, मेरी सोवियत यात्रा, तिब्बत में चौथी बार, माध्य एशिया की यात्रा, वोल्गा से गंगा, इत्यादि।

इन सबमें तीन यात्रा ज्यादातर प्रमुख है:- मेरी तिब्बत यात्रा (1937), मेरी लद्दाख यात्रा,(1939, और रूस में पचीस मास(1930), मेरी तिब्बत यात्रा का मुख्य उद्देश्य था:- बौद्ध ग्रंथों के पांडुलिपि की खोज करना और उनका अध्ययन करना।

मेरी लद्दाख यात्रा का उद्देश्य था:- लद्दाख के मठों, धार्मिक प्रथाओं और वहाँ के जनजीवन का अध्याय करना।

रूस के पचीस मास का उद्देश्य था, बोलसेविक क्रांति के बाद रूस की साम्यवादी व्यवस्था, सामाजिक, सांस्कृति विकास और शैक्षणिक सुधरो का गहन अध्ययन करना। इनके यात्रा वृतांत ग्रंथों की भाषा संस्कृतनिष्ठ, तर्कपूर्ण और पाठक को रोमांचित करने वाली है। यात्रा के दौरान वहाँ के विभिन्नताओं के बारे में जाना, प्रकृति, जलवायु, रहन-सहन, विचार,संस्कृति, समाज इत्यादि के बारे में बारीकियों से जानकारी प्राप्त कर अपने ग्रंथों में लिखा है। तिब्बत में विदेशियों का प्रवेश प्रतिबंधित था। इसी कारण एक भिक्षु (साधु) के वेश में ही उनको यात्रा करनी पड़ी और वहाँ छुप छुप कर रहना पड़ रहा था। भिक्षु वेश में ही वे तिब्बत के खतरनाक रास्तों से होकर दुर्लभ पांडुलिपियों को खच्चर पर लाद कर भारत ले आये थे।

रूस में वे पचीस महीने बिताए और वहाँ की स्थितियों के बारे में अध्ययन किया और लिखा।

इनका कहना था कि किताबों से ज्यादा दुनिया को देखकर सिखा जा सकता है, क्योंकि किताबी सीख के साथ दुनियादारी की सीख बहुत जरूरी होता है। राहुल सांकृत्यायन की इन सभी यात्रा वृतांतों का विस्तृत वर्णन (“मेरी जीवन यात्रा”) आत्मकथा में मिलता है।
—---------

पुनीता कुमारी श्रीवास्तव
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ