Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

समाज, राजनीति और जिम्मेदारी की लक्ष्मण रेखा है - “शब्दों की मर्यादा”

समाज, राजनीति और जिम्मेदारी की लक्ष्मण रेखा है - “शब्दों की मर्यादा”

दिव्य रश्मि के उपसंपादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से।

मनुष्य को अन्य जीवों से जो सबसे महत्वपूर्ण विशेषता अलग करती है, वह है उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता। यह अभिव्यक्ति केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह उसके संस्कार, चरित्र, नैतिकता और सामाजिक चेतना का दर्पण भी है। हमारे शब्द ही वह पहली सीढ़ी हैं, जिन पर चढ़कर हम अपने व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इन्हीं शब्दों में शिष्टता, नैतिकता और सम्मान की लक्ष्मण रेखा खिंची होती है।

जब हम बोलते हैं, तो केवल ध्वनि नहीं निकलती, बल्कि हमारे भीतर के संस्कार बाहर आते हैं। इसलिए कहा जाता है कि “वाणी में ही व्यक्ति का मूल्य छिपा होता है।” यदि शब्द संयमित और मर्यादित हो, तो वे रिश्तों को मजबूत बनाते हैं, लेकिन यदि वे कटु, अपमानजनक और असंयमित हो, तो वही शब्द रिश्तों को तोड़ने का कारण बन जाते हैं।

आज के समय में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि क्या हम अपने शब्दों की मर्यादा को समझते हैं? क्या हम उस लक्ष्मण रेखा का सम्मान करते हैं, जो समाज को संतुलित बनाए रखती है?

शब्द केवल संचार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे व्यक्ति के चरित्र का परिचायक होते हैं। जिस प्रकार किसी व्यक्ति का व्यवहार उसके संस्कारों को दर्शाता है, उसी प्रकार उसकी भाषा उसके आंतरिक विचारों का प्रतिबिंब होती है। मीठे और संयमित शब्द व्यक्ति को सम्मान दिलाते हैं। कटु और अपमानजनक भाषा व्यक्ति को समाज से अलग कर देती है। झूठे आरोप और गलत बयान व्यक्ति की विश्वसनीयता को समाप्त कर देते हैं। यह बात केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी लागू होती है। जब समाज के प्रभावशाली लोग अपनी भाषा की मर्यादा भूल जाते हैं, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है।

परिवार किसी भी समाज की मूल इकाई होता है। यदि परिवार में संवाद स्वस्थ और मर्यादित हो, तो समाज भी मजबूत होता है। लेकिन जब परिवार के भीतर ही भाषा की मर्यादा टूटने लगती है, तो उसका सीधा असर रिश्तों पर पड़ता है। माता-पिता की भाषा बच्चों के संस्कार निर्धारित करती है। पति-पत्नी के बीच संवाद का स्तर परिवार की स्थिरता तय करता है। बुजुर्गों के प्रति सम्मानजनक भाषा परिवार की संस्कृति को जीवित रखती है। यदि परिवार में अपमानजनक भाषा का प्रयोग होने लगे, तो धीरे-धीरे वह सामान्य व्यवहार बन जाता है। यही व्यवहार आगे चलकर समाज में भी फैलता है।

समाज में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संतुलन का आधार भी है। जब समाज में लोग एक-दूसरे के प्रति सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं, तो वहां विश्वास और सहयोग की भावना विकसित होती है। आज के समय में यह देखने को मिलता है कि सोशल मीडिया पर अपमानजनक टिप्पणियां आम हो गई हैं। बिना प्रमाण के आरोप लगाना एक सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है। व्यक्तिगत हमले और चरित्र हनन को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का नाम दिया जा रहा है। यह स्थिति समाज के लिए अत्यंत खतरनाक है, क्योंकि इससे सामाजिक ताने-बाने में दरारें पड़ती हैं।

राजनीति समाज का नेतृत्व करती है। इसलिए राजनीति में भाषा का स्तर समाज की दिशा तय करता है। लेकिन वर्तमान समय में राजनीति में भाषा का स्तर चिंताजनक रूप से गिरा है। नेताओं के बीच व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप बढ़ गए हैं। नीतिगत बहस की जगह व्यक्तिगत हमले हावी हो गए हैं। जनता के सामने गलत उदाहरण प्रस्तुत हो रहा है। जब देश के शीर्ष नेता ही मर्यादा का पालन नहीं करते, तो आम जनता से यह अपेक्षा करना कठिन हो जाता है कि वे संयमित भाषा का प्रयोग करें।

भारत में मानहानि से संबंधित कानून (IPC धारा 499 और 500) मौजूद हैं, जिनका उद्देश्य व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा करना है। लेकिन व्यवहारिक रूप से इन कानूनों की प्रभावशीलता पर कई सवाल उठते हैं। मामलों का लंबा समय तक लंबित रहना। न्याय मिलने में देरी। सजा का प्रभावी न होना। माफी मांगकर मामले को समाप्त कर देना। इन कारणों से लोगों में यह धारणा बन जाती है कि वे कुछ भी कह सकते हैं और उससे बच निकलेंगे। यह स्थिति कानून की गंभीरता को कमजोर करती है।

न्यायपालिका को समाज का संरक्षक माना जाता है। लेकिन जब न्याय प्रक्रिया धीमी होती है या निर्णयों में स्पष्टता नहीं होती, तो इसका असर समाज पर पड़ता है। न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान होती है। त्वरित और निष्पक्ष न्याय समाज में विश्वास बनाए रखता है। न्यायपालिका की सक्रियता समाज में अनुशासन स्थापित करती है। यदि न्यायपालिका अपनी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाए, तो समाज में भाषा और व्यवहार दोनों में सुधार आ सकता है।

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को आसान बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही यह अराजकता का माध्यम भी बन गया है। फेक न्यूज का प्रसार। ट्रोलिंग और साइबर बुलिंग।mबिना तथ्य के आरोप। व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप। यह मंच जहां एक ओर लोकतंत्र को मजबूत करता है, वहीं दूसरी ओर मर्यादा को भी चुनौती देता है।

समाज में परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति से होती है। यदि हर व्यक्ति अपने शब्दों की मर्यादा को समझे और उसका पालन करे, तो समाज में सकारात्मक बदलाव संभव है। बोलने से पहले सोचें। सत्य और प्रमाण के आधार पर ही बात करें।दूसरों के सम्मान का ध्यान रखें। सोशल मीडिया पर संयमित व्यवहार करें।

“लक्ष्मण रेखा” केवल एक पौराणिक कथा का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह हमें बताती है कि हर चीज की एक सीमा होती है, और उस सीमा का उल्लंघन विनाश का कारण बन सकता है। आधुनिक संदर्भ में लक्ष्मण रेखा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी एक सीमा है। आलोचना और अपमान में अंतर समझना आवश्यक है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मतलब दूसरों को आहत करना नहीं है।

समाज में नेतृत्व करने वाले लोगों की जिम्मेदारी अधिक होती है। उनके शब्द और व्यवहार समाज के लिए उदाहरण बनते हैं। नेताओं से अपेक्षाएं होती है कि मर्यादित भाषा का प्रयोग। तथ्य आधारित बयान। व्यक्तिगत आरोपों से बचाव। समाज में सकारात्मक संदेश देना। यदि नेता अपनी भाषा सुधार लें, तो समाज में स्वतः सुधार आ सकता है।

मीडिया समाज का दर्पण होता है, लेकिन आज कई बार यह सनसनी फैलाने का माध्यम बन जाता है। मीडिया की जिम्मेदारी होती है कि सत्य और निष्पक्षता बनाए रखना। अपमानजनक भाषा को बढ़ावा न देना। समाज में सकारात्मक संवाद को प्रोत्साहित करना।

भाषा की मर्यादा का संबंध शिक्षा और संस्कार से भी है। यदि बच्चों को शुरू से ही सही भाषा और व्यवहार सिखाया जाए, तो भविष्य में समाज बेहतर बन सकता है। नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देना। संवाद कौशल का विकास। सहिष्णुता और सम्मान की भावना पैदा करना।

यह समझना आवश्यक है कि समाज का निर्माण हमारे छोटे-छोटे प्रयासों से होता है। यदि हम अपने शब्दों की मर्यादा को समझें और उसका पालन करें, तो यह एक बड़ा बदलाव ला सकता है। हमारा कदम भले छोटा हो, लेकिन उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है। हमें यह याद रखना चाहिए कि “शब्दों की मर्यादा ही समाज की मर्यादा है।” यदि हम इस लक्ष्मण रेखा का सम्मान करेंगे, तो न केवल हमारे रिश्ते मजबूत होंगे, बल्कि समाज भी अधिक संतुलित और सभ्य बनेगा।

हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ