ज्येष्ठ मास महात्मय {षष्ठ अध्याय}

आनन्द हठीला
पार्वतीजी बोली कि हे प्रभो! इस व्रत को किसी ने किया ? और व्रत का पूर्ण फल प्राप्त किया है क्या ? वह सब इतिहास के सहित आप मुझसे कहिये ॥१॥
शिवजी बोले कि त्रेतायुग के पूर्ण होने पर कहीं पर धूर्जटि नामक ब्राह्मण हुआ वह द्विजकुल में पूजित, धनी, अनेक वान्धव से युक्त था ॥ २ ॥
परन्तु सन्तान के न होने से दुखी होकर महान् नियम में स्थित होकर उसने विधिपूर्वक अनेक व्रत तथा दानों को किया ।। ३ ।।
इस तरह व्रत करते बहुत समय के बाद एक मनोहर कन्या पैदा हुई। विवाहयोग्य कन्या को देखकर ब्राह्मण स्त्री से विचार करने लगा कि ॥ ४ ॥
हे शोभने ! इस सुन्दर कन्या को किसे दें, इसके समान वर देखने मे नही आ रहा है ।। ५ ।।
यह कहकर वर खोजने के निमित्त गृह से शीघ्र निकल कर एक ग्राम के बाद दूसरे ग्राम मे तथा बहुत से नगरो में जाने के बाद ।। ६ ।।
राजाओं के मण्डल मे गया। अनेक क्षेत्रों मे भी जाकर उस ब्राह्मणश्रेष्ठ को जब कन्या के योग्य वर न मिला । ७ ॥
तब शुद्धात्मा ऋषियों के सुन्दर तपोवन में जाकर अन्वेपण किया। तदनन्तर कोशिक ऋषि के आश्रम में ब्राह्मणश्रेष्ठ को देखा ।। ८ ।।
उस ब्राह्मण का शिवशर्मा नाम था और वह माता पिता से हीन था। उसका दूसरा प्रसिद्ध नाम रूपराशी था ।। ९ ।।
समस्त भूमण्डल मे उसके समान किसी का भी रूप नहीं था इसलिये ऋपियों ने उसका रूपराशी नाम रख दिया ॥ १० ॥
धूजेटि ने उन ऋषियों के पास जाकर अपना सब आशय कहा, ऋपियों के विवाह प्रस्ताव का अनुमोदन करने पर शिवशर्मा को साथ में लेकर धूर्जटि ॥ ११ ॥
हर्ष से प्रफुल्ल मन होकर अपने नगर को आये और समस्त बन्धुजनों को एकत्रित कर कन्या का शिवशर्मा के साथ विवाह कर दिया ॥ १२ ॥
और पास मे ही रहने के निमित्त गृह दिया, गोधन, धन और अनेक तरह के भेट दिये, अन्य ब्राह्मणों को भी बहुत सी दक्षिणा दी ॥ १३ ॥
शिवशर्मा ब्राह्मण उस सुशीला गुणवती के साथ प्रपञ्चजनित अपूर्व सुख का आनन्द करने लगा ॥१४॥
इसके बहुत समय बाद काल से प्रेरित वह शिवशर्मा ब्राह्मण समिधा के निमित्त वन को गया और उस वन के वृक्ष की छाया में जाकर बैठ गया तथा शीतल जल पीने के बाद उसी वृच्च की छाया मे सो गया ।॥१५॥
उसी समय शिवशर्मा ब्राह्मण को अजगर ने आकर लील लिया। वहां लीलते किसी ने देखा नहीं और सूर्यनारायण अस्ताचल को चले गये ॥ १६ ॥
सूर्यास्त हो जाने पर सेवकों को साथ लेकर सास ससुर और उसकी स्त्री ने समस्त वन के स्थानों में दीपिका (मसाल) के सहारे खोज किया ॥ १७ ॥
रात्रिभर अन्वेषण (खोज) करने के बाद सूर्योदय होने पर शिवशर्मा ब्राह्मण न मिला, तब वे निराश और दुखी होकर अपने गृह चले आये ॥ १८॥
तदनन्तर पतिव्रता गुणवती शोकाकुल हो पिता के गृह में रहने लगी और नित्य देवता के पूजन में रत रहती थी ॥ १९ ॥
किसी समय दैवयोग से उसके यहाँ नारदजी आये ॥ २० ॥
गुणवती ने नारदजी का विधिवत् पूजन किया और बारम्बार प्रणाम किया। इससे प्रसन्नात्मा नारदजी ने गुणवती को व्रत का उपदेश किया ॥ २१ ॥
नारदजी वोले कि हे भद्रे ! ज्येष्ठमास में तू पवित्र रम्भाव्रत को कर और विधान से भर्तृस्वरूप देव का पूजन कर ॥ २२ ॥
और हे अनघे ! अनन्य मन से जीवनपर्यन्त इस व्रत को कर। इस व्रत के प्रभाव से विष्णु भगवान् को पतिरूप मे पाकर शाश्वत (स्थायी) पद को तू प्राप्त करेगी ।। २३ ।।
हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार नारदजी के उपदेश करने पर वनवासिनी गुणवती ने कदलीवन लगाया ॥ २४ ॥
और नारदजी के कथनानुसार समस्त कर्म को किया और इस तरह बहुत समय बीत जाने पर जरा से अत्यन्त जर्जर हो गई ॥ २५ ॥
और उसी वन में मृत्यु के होने पर विमान मे सवार होकर स्वर्ग को गई। जन्मान्तर में उस व्रत के पुण्यराशि से विष्णु की वल्लभा तुलसी हुई ॥ २६ ॥
विष्णु भगवान् को सिवाय तुलसी के दूसरी कोई वरतु प्रिय नहीं है। हे ब्राह्मण लोग ! इस व्रत को श्रीशिवजी की आज्ञा से पार्वतीजी ने भी किया ॥ २७ ॥
और इसी व्रत के प्रभाव से पार्वतीजी श्रीशिव को प्रिय हुई ।॥ २८ ॥
श्री स्कन्दजी के मुख से श्रेष्ठ माहात्म्य को सुनकर प्रसन्न ब्रह्मर्पियों ने पुष्पों की माला तथा भूषणों से स्कन्दजी का पूजन किया, जो कि स्कन्दजी पार्वती के आनन्द के कन्द और कमल समान छ (छ) मुखों को धारण करने वाले है ॥ २९ ॥
इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भाषाटोकायां पष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
क्रमशः...〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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