राष्ट्रीयता और सनातन संस्कृति का संगम है दिव्य रश्मि
सत्येन्द्र कुमार पाठक
पटना से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित हिंदी मासिक पत्रिका 'दिव्य रश्मि' ने अपने मई 2026 के अंक को प्रखर राष्ट्रवादी और महान स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) को समर्पित किया है। डॉ. राकेश दत्त मिश्र के कुशल संपादन में निकला यह विशेषांक केवल एक पत्रिका का अंक भर नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीयता, सनातन मूल्यों और भारतीय स्वाभिमान का एक जीवंत दस्तावेज़ है ।
डॉ. राकेश दत्त मिश्र ने इस विशेषांक के माध्यम से सावरकर के 'हिंदुत्व' और 'राष्ट्रवाद' की अवधारणा को समकालीन संदर्भों में व्याख्यायित किया है। संपादन में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि वीर सावरकर के केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि उनके साहित्यिक और समाज सुधारक पक्ष को भी प्रमुखता मिले।
सनातन संस्कृति और राष्ट्रीयता का समावेश:का दिव्य रश्मि अंक के लेखों में इस बात पर बल दिया गया है कि भारत की राष्ट्रीयता उसकी सनातन संस्कृति की नींव पर टिकी है। सावरकर के 'सप्त बेड़ियों' को तोड़ने के आह्वान और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध उनके संघर्ष को सनातन धर्म के वास्तविक स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मई 2026 के इस अंक में सावरकर के कालापानी के संघर्ष, उनके काव्य सृजन और अखंड भारत के उनके स्वप्न पर गहन शोधपरक लेख संकलित हैं, जो आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
'दिव्य रश्मि' की स्थापना और वीर सावरकर की जयंती के शुभ अवसर पर २८ मई 2026 को पटना में एक भव्य समारोह का आयोजन निश्चित है। यह आयोजन वैचारिक मंथन और प्रतिभाओं के सम्मान का एक साझा मंच बनेगा। इस अवसर पर देश के जाने-माने साहित्यकार, प्रखर पत्रकार और समर्पित समाजसेवी अपने विचार साझा करेंगे। विमर्श का केंद्र 'राष्ट्र निर्माण में साहित्य की भूमिका' और 'सावरकर के विचारों की प्रासंगिकता' होगा ।समाज और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले विभूतियों को इस मंच से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान न केवल व्यक्ति का, बल्कि उन मूल्यों का सम्मान होगा जिन्होंने राष्ट्र को वैचारिक संबल प्रदान किया है।
'दिव्य रश्मि' का यह वीर सावरकर अंक और आगामी समारोह, बिहार की साहित्यिक राजधानी पटना में एक नई वैचारिक चेतना जागृत करने वाला सिद्ध होगा। राष्ट्रीयता और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पित यह प्रयास पत्रिका के 'दिव्य' और 'रश्मि' (प्रकाश) के नाम को सार्थक करता है। यह अंक संग्रहणीय है और समारोह स्मरणीय होने जा रहा है।
"सावरकर का अर्थ है - तेज, सावरकर का अर्थ है - त्याग, सावरकर का अर्थ है - तप।" पत्रिका का यह अंक इसी भाव को जन-जन तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता , आचार्यकुल , जहानाबाद , बिहार
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