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"निराधार का बोध"

"निराधार का बोध"

पंकज शर्मा
हर पुकार
एक आधार का भ्रम रचती है—
मानो कहीं कोई बिंदु है
जहाँ टिककर
अस्तित्व को विश्राम मिल सके।


हम बढ़ते हैं उसी ओर,
अपनी थकान, अपने भय,
अपनी आकांक्षाएँ समेटे—
और उन्हें टाँग देना चाहते हैं
किसी अदृश्य सहारे पर।


पर वह सहारा
स्पर्श में नहीं आता,
दृष्टि में नहीं ठहरता—
जैसे शून्य की कोई दीवार
जिसे हम ठोस मान बैठे हों।


तब ज्ञात होता है—
हम टिके नहीं हैं,
हम केवल ठहरने का अभिनय कर रहे हैं,
और भीतर कहीं
सब कुछ निरंतर डोल रहा है।


हवा में लटके हुए क्षण
स्थायित्व का आभास देते हैं,
पर एक हल्की सी असावधानी
उन्हें गिरा देती है—
अचानक, बिना चेतावनी।


गिरना तब
केवल देह का नहीं होता,
विश्वास का भी होता है—
जो हमने अपने ही हाथों
एक असत्य पर टिका दिया था।


और तब समझ में आता है—
आधार की खोज
शायद एक अनावश्यक यात्रा थी,
क्योंकि जो है
वह स्वयं ही अनाधार है।


इस बोध में
एक विचित्र स्वतंत्रता छिपी है—
जब कोई खूंटी नहीं,
तो गिरने का भय भी नहीं,
केवल होना है—अकिंचन, अनंत।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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