ज्येष्ठ मास महात्मय {प्रथम अध्याय}

आनन्द हठीला
अथ ज्येष्ठमासमाहात्म्यं प्रारभ्यते
ऋषि लोग स्कन्दजी से बोले कि हे षडानन ! हमलोगों ने विस्तार पूर्वक वैशाखमास का माहात्म्य भी सुना, परन्तु फिर भी मन को तृप्ति न हुई ॥१॥
इसलिये सबको सन्तुष्ट कर देने वाला ज्येष्ठ मास के माहात्म्य को कृपा कर आप कहिये, जिसके द्वारा श्रोताओं के पाप का नाश हो। इस ज्येष्ठ मास के देवता कौन हैं, इसके सेवन से फल क्या विष्णुर्वै होता है और इसके सेवन की विधि क्या है? यह सब हमलोगों से कहिये ॥ २ ॥
स्कन्दजी ऋपियों से बोले कि हे महाभाग ! ठीक है, आपलोगों ने लोकोपकार के लिये उचित प्रश्न किया है। मैं ज्येष्ठ मास के माहात्म्य को कहता हूँ ॥३॥
जिस तरह समस्त देवताओं में विष्णु भगवान् बड़े हैं, प्रशंसनीय हैं और प्रजाओं के पालनकर्ता हैं उसी तरह यह ज्येष्ठ मास समस्त मासों में श्रेष्ठतम (अति श्रेष्ठ) कहा है ॥ ४ ॥
जिस ज्येष्ठ मास के समस्त दिवस श्रेष्ठ है और पव. के समान हैं, इसलिये यह मास समस्त लोकों में श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ ५ ॥
इस ज्येष्ठ' मास मे शौच आचार से युक्त होकर प्रातःकाल स्नान करना चाहिये। इस तरह दशाश्वमेध तीर्थ मे स्नान करने से गङ्गा लोकों को पवित्र करती है ।। ६ ।।
समस्त पापों के नाश के लिये ज्येष्ठ मास मे स्नान करे और दशाश्वमेधेश्वर का दर्शन करे तो उस स्नानकर्ता का पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ७ ॥
उस ज्येष्ठ मास के दिवस पुण्यतम और धर्मयुक्त हैं, जिस ज्येष्ठ मास में पापनाशिनी सुन्दर स्रोतवाहिनी जाह्नवी अवतीर्ण हुई ॥ ८ ॥
ज्येष्ठ मास के समस्त तिथियों में अधिक पुण्यप्रद दशमी तिथि दश्विध पापों का शमन करनेवाली है, उस दिन स्नान और दान अवश्य करना चाहिये ॥९॥
जलपूर्ण घटदान, जलदान (पौसरा), तालपत्र (व्यजन) दान, चन्दन' दान, छत्रदान, और जूतादान श्रीत्रिविक्रम भगवान् के प्रीत्यर्थ करना चाहिये ॥ १० ॥
जुतादान का मन्त्र - हे केशव ! कण्टक, शर्करा आदि से रक्षा के निमित्त जुतादान करूंगा जो कि सब स्थानों मे सुख देने वाला है, इसलिये जूतादान से आप मुझे शान्ति प्रदान करें ॥ ११ ॥
छत्रदान का मन्त्र -हे केशव ! हे प्रभो ! इस लोक और परलोक में घाम से मेरी रक्षा करें, हे प्रभो! यह छत्र आपके प्रीत्यर्थ मैंने आपके चन्दनं रुचिरं प्रिय ब्राह्मण को दिया ॥१२॥
शर्करा जल से पूर्ण घटदान का मन्त्र- मैंने शर्करा जल से पूर्ण घट का दान दिया है, इस शर्वत से पूर्ण घटदान से वैतीस (३३) तिथि के देवता तृप्त होवें ॥ १३ ॥
व्यजन दान का धर्म को शमन करने वाला, श्री विष्णु भगवान् का प्रिय व्यजन श्रीत्रिवित्रम भगवान् के प्रीत्यर्थ में भूसुर (ब्राह्मण) को देता हूँ ।। १४ ॥
चन्दन दान का मन्त्र - यह कपूर खश से युक्त चन्दन सुन्दर रुचिकर है इसका मैं दान करता हूँ इसके दान से देवता ऋषि पितर मनुष्य तृप्त होवें ।। १५ ।।
इस तरह अपने शक्ति के अनुसार बहुत से दानों को देना चाहिये । और प्राणिमात्र के लिये निर्जल देश में जलदान (पौसरा) देना चाहिये ॥ १६ ॥
जो प्राणिमात्र के लिये जलदान (पौसरा) देने में असमर्थ है वह ब्राह्मण के लिये प्रतिदिन जलदान करे। और पीपल वट आदि वृक्षों का अनेकविध जल से सिञ्चन करे ॥ १७ ॥
जलदान से श्रेष्ठ दान न हुआ न होगा, इललिये सब उपाय से चारु जलदान का विधान किया है ॥ १८ ॥
जो मनुष्य ज्येष्ठ मास में मोहवश जलदान को नहीं करते हैं, वे लोग घोर नरकों की यातना को भोगकर पुनः पृथिवी पर चातक (पपीहा) होते हैं ॥ १९ ॥
इस विषय में पुरातन इतिहास को में आपसे कहूँगा । पूर्वकाल त्रेतायुग के अन्त में माहिष्मती पुरी मे ब्राह्मण श्रेष्ठ ॥ २० ॥
वेद वेदाङ्ग का पारङ्गत्त धर्मात्मा सुमन्तु नामक ब्राह्मण हुआ। उस ब्राह्मण की गुणमती नामक स्त्री और देवशर्मा नामक पुत्र था ॥ २१ ॥
ब्राह्मणपुत्र देवशर्मा हमेशा देवतापूजन में निरत और अभ्यागत (अतिथि) प्रिय था। किसी समय दैवयोग से समिधा ॐ को लाने के लिये वन को गया ।॥२२॥
वहाँ प्रतप्त तेज किरणों के लगने से और तृपा से अत्यन्त व्याकुल हो गया। उस वन के जलराशि (तालाब) के समीप जाकर वृक्ष की छाया मे बैठकर ॥२३॥
जल पीकर जल के समीप बैठकर सो गया, उस ब्राह्मण के भय से उस वन के जो मृग और पक्षिगण आदि थे ॥ २४ ॥
वे सब तृषा से पीड़ित होकर व्याकुल हो गये और उनमें से कुछ मर भी गये। सूर्यनारायण के अस्ताचल चले जाने पर जब निद्रा दूर हुई तब वह ब्राह्मण अपने गृह को गया ।। २५ ।।
जब अज्ञात दोष से युक्त वह ब्राह्मण मर गया तव उसके साथ उसकी पतिव्रता स्त्री ने पुत्र धन आदि का त्याग कर अग्नि में प्रवेश किया ॥ २६॥
ब्राह्मण वन में हुए अज्ञात कर्म दोष के फल से अनेक नरकों को भोगकर पुनः इस लोक मे स्त्री के साथ चातक योनि में आकर अत्यन्त दुखी हो गया ॥ २७ ॥
पूर्णजन्म के पाप को स्मरण करता हुआ अपने गृह में आकर और अपने वृक्ष के खोड़रा मे बैठकर निरन्तर करुणापूर्णक रोदन करने लगा ।। २८ ।।
उसके क्रन्दन को सुनकर उसके पुत्र ने अनेक बार मना किया परन्तु वह उस वृक्ष के खोड़ा से नहीं निकला । तब क्रुद्ध पुत्र ने उस वृक्ष के कोटर (खोड़रा) में आग लगा दो ॥ २६ ॥
उस अग्नि के ताप से दोनों (चातक चातकी) के पच जल गये और वे दोनों रात्रि मे उस वृक्ष के नीचे जमीन पर गिर गये तथा परस्पर कष्ट को कहने लगे, इनके परस्पर कष्ट की बात को सुनकर पुत्र भी विस्मित हो गया ॥ ३०॥
और वहाँ से आकर पवित्र आश्रम में जाकर उसने ब्राह्मण श्रेष्ठों से पूछा। और उन ब्राह्मणों से अपने पिता के उद्धार का साधन जानकर वह अपने गृह को गया ॥ ३१ ॥
उस ऋषिश्रेष्ठ ने विविपूर्वक निर्जल देश में प्रपा (पौसरा) को बैठा दिया और उस प्रवा के पुण्य प्रभाव से उसके माता पिता चातक योनि से छूटकर दिव्य रूप होकर ।॥ ३२ ॥
श्रेष्ठ विमान पर चढ़कर विष्णु-भगवान् के धाम को गये । हे विप्र लोग ! मैंने पूर्व का वृत्तान्त आप लोगों से कहा ॥ ३३ ॥
जो कि जल-मार्ग के अवरोध के बाद जलदान का अद्भुत महिमा वर्णित है ॥ ३४ ॥
इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवं-शोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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