
मुक्तिनाथ मंदिर की पावन धरती पर हिंदू राष्ट्र एवं सनातन चेतना पर संगोष्ठी संपन्न
हिमालय की गोद में स्थित विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल मुक्तिनाथ मंदिर में हिंदू राष्ट्र एवं सनातन वैदिक संस्कृति के संरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम नेपाल के मुस्तांग जिला मुख्यालय जॉमसम, गांडकी प्रदेश में पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्य गोवर्धन पीठाधीश्वर महाराज के अभियान को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से आयोजित हुआ।

अपने प्रभावशाली उद्बोधन में प्रेमचंद्र झा ने कहा कि आदि शंकराचार्य भगवान का प्राकट्य ईसा से 507 वर्ष पूर्व हुआ था। उन्होंने मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में सनातन धर्म के संरक्षण एवं पुनर्जागरण के लिए चारों धामों का पुनरुद्धार कर चार प्रमुख पीठों की स्थापना की और संपूर्ण भारतवर्ष को सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक सूत्र में बांधने का कार्य किया।
उन्होंने कहा कि यदि आदि शंकराचार्य भगवान का अवतरण नहीं हुआ होता तो सनातन संस्कृति एवं भारतीय पहचान आज सुरक्षित नहीं रह पाती। वर्तमान समय में उसी महान परंपरा का निर्वहन करते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य गोवर्धन पीठाधीश्वर महाराज भारत एवं नेपाल में निरंतर धर्म, संस्कृति और विश्व शांति का संदेश दे रहे हैं।
प्रेमचंद्र झा ने बताया कि शंकराचार्य जी महाराज वर्ष के 365 दिनों में से 250 दिनों से अधिक समय भारत एवं नेपाल की यात्रा में व्यतीत करते हैं। उन्होंने अब तक लगभग 200 ग्रंथों की रचना की है तथा स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों, हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, मेडिकल कॉलेज एवं इंजीनियरिंग संस्थानों में धर्म सम्मेलन एवं संगोष्ठियों के माध्यम से सनातन वैदिक ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत एवं नेपाल का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंध हजारों वर्षों पुराना है तथा दोनों देशों में सनातन चेतना का पुनर्जागरण समय की आवश्यकता है। उनका उद्देश्य भारत एवं नेपाल को पुनः वैदिक संस्कृति एवं हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से जोड़कर विश्व शांति एवं मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है।
संगोष्ठी में उपस्थित अधिकारियों, समाजसेवियों एवं स्थानीय लोगों ने जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज के अभियान की सराहना करते हुए पूर्ण समर्थन देने का आश्वासन दिया। साथ ही सभी ने भविष्य में शंकराचार्य जी महाराज के दर्शन करने एवं उनके मार्गदर्शन प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की।
हिमालय की पवित्र वादियों में आयोजित यह संगोष्ठी भारत-नेपाल की साझा सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक एकता एवं विश्व शांति के संदेश को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण आयोजन माना जा रहा है।
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