तुम्हारे स्पर्श से जागा, मृगशिरा का मधुमास
कुमार महेंद्रअधर-ज्योति जुगनू-सी दमके,
कोकिल-कंठ बहे मधुराग।
नयनों में प्रिय-छवि झिलमिल,
पलकों पर मुस्कानों का फाग।
नर्तनमय रूप तुम्हारा देख,
उर-दिगंत हुआ प्रणय-प्रकाश।
तुम्हारे स्पर्श से जागा, मृगशिरा का मधुमास।।
आनन अरुण उदित रवि-सा,
अनुराग-अंबर में भरता।
गोल कपोलों की आभा से,
मन स्पर्श-सुधा को तरसता।
अक्षि-अंबुज से भाव-नीर झरे,
उमड़े उर-सागर में उल्लास।
तुम्हारे स्पर्श से जागा, मृगशिरा का मधुमास।।
नितंब-लय मंदाकिनी-सी,
मानो घन-घटा मृदु डोले।
चाँदनी चूमे तम के कोने,
मन-आँगन नव आलोक घोले।
प्राणों के निर्जन अंचल में,
नवोदित हुआ प्रीत उजास।
तुम्हारे स्पर्श से जागा, मृगशिरा का मधुमास।।
मनमोहक यौवन-अठखेली,
प्रिय-मिलन की मधुर पुकार।
हाव-भाव में छिपा निमंत्रण,
तृषा-तृप्ति का विस्तृत संसार।
रूप तुम्हारा निहार प्रियतम,
जागी हिय में मिलन-पिपास।
तुम्हारे स्पर्श से जागा, मृगशिरा का मधुमास।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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