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"नवोढ़ा की चूड़ियाँ"

"नवोढ़ा की चूड़ियाँ"

रचना --- डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
सुतल रही त आधी रतिया
ज़ोर से आँधी-पानी आइल,
बिजुरी चमके आसमान में,
करिया बदरिया छाइल रहे।
काँपे जियरा डर से गोरी के,
ठनका से घबराइल,
खनका के चूड़ी कलाई के,
सैयाँ के जगौले रहे।।


मद्धिम जलई ढिबिरिया तख्ती पर,
ओकरो हवा बुतौले,
लाज-शरम से मुँह न खोले,
पिया ओसारा सुतल रहे।
काँपत गोड़ से आके धीरे,
थोरके ऊ रहे सकुचाइल,
खनका के चूड़ी कलाई के,
सैयाँ के जगौले रहे।।


नींदिया न आवे बेचारी के,
अखियाँ में कजरवा बहल,
मटियाइल हम पड़ल रहियो,
अँचरा ओढ़े टहल रहे।
अकुलाई के गोरी फेर तब,
गोड़ के पायल बजवले,
सास-ननद के डर से बेचारी,
मन ही मन घबराइल रहे।
खनका के चूड़ी कलाई के,
सैयाँ के जगौले रहे।।


जब न जगल कपटी बलमुआ,
गालन पे हाथ फेरौले,
छूते बदन में सिहरन उठल,
नेहिया के दीप जरल रहे।
कहे “राकेश” विह्वल भइली,
हियरा से हियरा मिलल,
अँधियारी राती में दुनो परानी,
पीरीतीआ बरसाइल रहे।
खनका के चूड़ी कलाई के, सैयाँ के जगौले रहे।।
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