Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

बिहार संग्रहालय में लगे ' मिथिला चित्रकला

बिहार संग्रहालय में लगे ' मिथिला चित्रकला : आँगन से संग्रहालय तक ' प्रदर्शनी में जीवंत हुआ साठ वर्षों का इतिहास । पद्मश्री कलाकारों सहित कुल 56 कलाकारों के चित्रों को किया गया है प्रदर्शित । बिहार की धरोहर , मिथिला की आत्मा को दर्शाती यह अनुपम प्रदर्शनी 8 जून 2026 तक कलाप्रेमी आगंतुकों के लिए खुली रहेगी ।
- मोहिनी प्रिया

बिहार की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी मिथिला चित्रकला , जिसे मधुबनी पेंटिंग के नाम से भी जाना जाता है , आज विश्वभर में अपनी अलग पहचान बना चुकी है । यह कला न केवल रंगों का उत्सव है , बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और नारी शक्ति का जीवंत दस्तावेज भी है । 2007 में मिथिला चित्रकला को जीआई टैग मिला , जिससे इसकी प्रामाणिकता सुरक्षित हुई । पद्मश्री से सम्मानित जगदम्बा देवी , सीता देवी , बौआ देवी और गोदावरी दत्त जैसी कलाकारों ने इस कला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया । आज जापान , अमेरिका , फ्रांस के संग्रहालयों में मिथिला या मधुबनी पेंटिंग्स सजी हैं ।
मिथिला चित्रकला में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मनीषा झा के सौजन्य से बिहार संग्रहालय के बहुउद्देशीय सभागार में मिथिला चित्रकला : आँगन से संग्रहालय तक साठ वर्षों का सफर शीर्षक प्रदर्शनी का उद्घाटन दिनांक 9 मई 2026 को संध्या 5 बजे किया गया । इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में अंजनी कुमार सिंह , महानिदेशक , बिहार संग्रहालय , विशिष्ट अतिथि प्रणव कुमार , सचिव , कला-संस्कृति विभाग , बिहार सरकार , अशोक कुमार सिन्हा , अपर निदेशक , बिहार संग्रहालय , कला समीक्षक कौशिक कुमार झा तथा मिथिला चित्रकला में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त विजेता कलाकार मनीषा झा एवं उर्मिला देवी मंच पर उपस्थित रहे । प्रदर्शनी का उद्घाटन स्वागत गान से हुआ , जिसे मिथिला कलाकार निभा लाभ एवं मिथिला चित्रकला संस्थान , मधुबनी की छात्राओं ने प्रस्तुत किया । तत्पश्चात , इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों द्वारा प्रदर्शनी से संबंधित एक कैटालॉग का अनावरण किया गया ।
प्रदर्शनी की क्यूरेटर मनीषा झा ने सर्वप्रथम आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि मिथिला चित्रकला बिहार की महिलाओं की मौनशक्ति का एक जीवंत प्रमाण है । सदियों तक यह कला एक अनुष्ठानिक भाषा के रूप में जीवित रही एक पवित्र ज्यामिति , जिसका अभ्यास घर के आँगन की निजी सीमाओं के भीतर किया जाता था । यह कोई ऐसी विधा नहीं थी जिसे स्कूलों में सिखाया जाता हो , बल्कि यह माँ से बेटी तक पहुँचती रही , हाथों की स्मृति में सुरक्षित रही और पीढ़ियों की अटूट श्रद्धा से विकसित हुई । बिहार संग्रहालय की यह प्रदर्शनी मिथिला कला के इसी असाधारण विकास का उत्सव मनाती है । यह गाँव के घरों के मिट्टी वाले आँगन से निकल कर एक विश्वस्तरीय संग्रहालय के प्रतिष्ठित गलियारों तक की यात्रा के रूप में परिवर्तन की एक अनूठी गाथा है । यह प्रदर्शनी इस कला रूप के साथ मेरे व्यक्तिगत 40 वर्षों के जुड़ाव और पिछले 30 वर्षों के दौरान संग्रहित कलाकृतियों का निचोड़ है ।
विशिष्ट अतिथि कला-संस्कृति विभाग , बिहार सरकार के सचिव श्री प्रणव कुमार ने कहा कि मिथिला कला बिहार की विरासत का एक प्रतिबिंब है । बिहार की संस्कृति , भारत की संस्कृति को प्रतिबिंबित करता है । बिहार पूरे देश और विदेश में मिथिला पेंटिंग के कारण जाना जाता है । मैं मॉरीशस गया था तो वहाँ देखा कि मिथिला पेंटिंग का शिक्षण प्रशिक्षण किया जा रहा है । वहाँ एक वेबसाइट बना लिया गया है । मिथिला चित्रकला संस्थान के द्वारा ग्लोबल प्लेटफॉर्म दिया जा रहा है । उन्होंने बताया कि बिहार सरकार भी सतत रूप से बिहार की लोक-कलाओं को बढ़ावा देने का कार्य कर रही है । इसके लिए राज्य सहित राष्ट्रीय स्तर पर भी कई सारे प्रशिक्षण एवं बिक्री केंद्र स्थापित किए गए हैं । मिथिला कला भी बिहार की एक खूबसूरत लोक कला है , जिसे जीआई टैग प्राप्त है । राज्य सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है कि आज यह कला बिहार से बाहर निकल कर देश-विदेश तक में अपनी विशेष पहचान बना चुकी है , जिसका सीधा फायदा लोक कलाकारों को मिल रहा है ।
अपने उद्‌घाटन संबोधन में बिहार संग्रहालय के महानिदेशक श्री अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि बिहार का मिथिला क्षेत्र अपनी उच्च कोटि की सभ्यता-संस्कृति और लोक परंपराओं के लिए शुरू से विख्यात रहा है । मिथिला चित्रकला इसी विरासत का एक स्वर्णिम अध्याय है , जिसका पाठ एक से दूसरी पीढ़ी तक किसी स्कूल-कॉलेज के माध्यम से नहीं , बल्कि घर के आँगन , देहरी तथा पूजा स्थलों पर किए जाने वाले चित्रों के जरिए स्थानांतरित होता आ रहा है । इस स्थानांतरण में महिलाओं की विशेष भूमिका रही है , क्योंकि घर-परिवार की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनकी ही होती है । एक माँ से बेटी तक और फिर बेटी से उसकी बेटी तक का सफर तय करते-करते यह चित्रकला वर्तमान में उस स्तर तक पहुँच गई है , जहाँ भारत समेत पूरी दुनिया के बाजार में इसकी एक विशिष्ट पहचान बन गई है । मिथिला पेंटिंग्स विदेशों में काफी ऊँची कीमत पर बिकती है । यह प्रदर्शनी मिथिला चित्रकला की समृद्ध परंपरा , उसके विकास और विभिन्न आयामों को दर्शाती है । वर्ष 1934 में डब्ल्यू जी. आर्चर द्वारा खोज किए गए ऐतिहासिक अभिलेखों से लेकर 1960 के दशक में कागज पर उकेरी गई मौलिक कृतियों तथा 1980-90 के दशक के जीवंत वैश्विक कार्यों के सिरों को आपस में जोड़ती है । निश्चित ही यह दर्शकों के लिए एक यादगार अनुभव साबित होगा और इसके माध्यम से उन्हें मिथिला चित्रकला के परंपरागत इतिहास एवं स्वरुप को जानने-समझने में मदद मिलेगी ।
बिहार संग्रहालय के अपर निदेशक श्री अशोक कुमार सिन्हा ने अपने संबोधन में मिथिला चित्रकला की विकास यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मिथिला चित्रकला तालाब का शांत पानी नहीं है । समय के साथ इस कला में बदलाव होता रहा है । जब वर्ष 1964-65 में बिहार में भीषण अकाल पड़ा था , उस दौरान मिथिला चित्रकला घर-आंगन की देहरी तथा दीवारों से उतर कर कैनवास पर आई । वहीं से इसकी शुरुआत मानी जाती है । उससे पूर्व इस चित्रकला के बारे में कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है । इस चित्रकला की शुरुआत से लेकर अब तक के सफर पर नजर डालें , तो डिजाइन , मोटिफ , रंग , संयोजन , आधारभूत सामग्री आदि सभी में परिवर्तन आते गए । बदलाव की इसी श्रृंखला को देखने के लिए यह प्रदर्शनी लगाई गई है । इस प्रदर्शनी में मिथिला चित्रकला की इसी साठ वर्षीय यात्रा को क्रमवार रूप से दर्शाया गया है । यह प्रदर्शनी शोधार्थियों , प्रशंसकों , कला समीक्षकों आदि के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी । बिहार में पहली बार मिथिला चित्रकला के क्रमिक विकास यात्रा पर आधारित ऐसी प्रदर्शनी आयोजित हुई है । मिथिला कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता मनीषा झा की अध्यक्षता में यह प्रदर्शनी आयोजित की गई है। मनीषा अब तक 15 से भी अधिक देशों में मिथिला चित्रकला की करीब 250 से भी अधिक प्रदर्शनी आयोजित कर चुकी हैं ।
मिथिला चित्रकला की गोदना शैली में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकार उर्मिला देवी के अनुसार यह प्रदर्शनी इस मायने में बेहद खास है कि इसके माध्यम से आपको मिथिला चित्रकला के इतिहास एवं विकास यात्रा के साथ-साथ इसकी विभिन्न शैलियों में हुए बदलाव की बारीकी को भी जानने-समझने का मौका मिलेगा । मेरी गोदना शैली की एक पेंटिंग आपको गोदना में पारंपरिक रूप से प्रयुक्त होने वाले सारे मोटिफ एक जगह देखने को मिलते हैं । वहीं रमा देवी द्वारा निर्मित गोदना पेंटिंग देखने पर आपको उसमें उर्ध्व लकीरों तथा छोटी आकृतियों के पैटर्न का दुहराव दिखेगा । वहीं चानो देवी की गोदना पेंटिंग माचिस की तीली और घर में बने कालिख से बनी है , लेकिन उसकी बारीकी आपको अचंभित कर देगी । इसी तरह समान शैली में निर्मित अन्य तस्वीरों में भी इसी तरह की बारीकी दिखती है । इससे पता चलता है कि मिथिला चित्रकला का इतिहास कितना विस्तारित है ।
अंत में , आगत अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कला समीक्षक कौशिक कुमार झा ने बताया कि जब बौआ देवी तथा अन्य मिथिला कलाकार जापान जाते थे और महीनों वहाँ रह कर हासेगावा की आर्ट गैलरी के लिए चित्र बनाया करते थे , तो हासेगावा उनसे कहते थे कि सौ बरस बाद भारत के लोगों को मिथिला चित्रकला देखने के लिए जापान आना पड़ेगा । शायद उन्होंने भारत में मिथिला चित्रकला के प्रति कलाकारों के उपेक्षित नजरिए को देखते हुए ऐसा कहा था , लेकिन आज भारत के एक विश्वस्तरीय संस्थान में आयोजित इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी के आयोजन से उनका यह कथन गलत साबित हो गया है । इसके लिए मैं बिहार संग्रहालय प्रबंधन की पूरी टीम सहित विशेष रूप से महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह और अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा का विशेष रूप से आभार व्यक्त करना चाहूंगा , जिनके सहयोग से बिहार में इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी का आयोजन संभव हो सका है । सभागार कार्यक्रम के पश्चात महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह एवं सचिव प्रणव कुमार सिंह ने बिहार संग्रहालय के बहुउद्देशीय दीर्घा में आयोजित प्रदर्शनी का फीता काट कर विधिवत उद्‌घाटन किया । तत्पश्चात सभी अतिथियों ने दीर्घा में घूमते हुए एक-एक कर सभी प्रदर्शित कलाकृतियों का अवलोकन किया एवं उसकी सराहना की । इस प्रदर्शनी में जगदम्बा देवी , सीता देवी , बौआ देवी , अनमना देवी , गोदावरी दत्त , गोपाल शाह , विमला दत्त , चानो देवी , शांति देवी , उर्मिला देवी तथा रंजन पासवान की पेंटिंग विशेष आकर्षण का केंद्र है । अतः इस तरह की प्रदर्शनी से बिहार की लोक कलाकारों की कलाओं को वैश्विक स्तर पर प्रोत्साहन देना सराहनीय है । मिथिला कला बिहार की शान बन चुकी है । - मोहिनी प्रिया
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ