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भारत का गौरव, इतिहास का सच और मानसिक गुलामी पर प्रहार

भारत का गौरव, इतिहास का सच और मानसिक गुलामी पर प्रहार

लेखक: आनन्द हठीला

आज एक सुनियोजित तरीके से यह नैरेटिव फैलाया जाता है कि भारत में कभी शिक्षा नहीं थी, विज्ञान नहीं था, रोजगार नहीं था और समाज केवल शोषण पर आधारित था। कुछ तथाकथित इतिहासकार और वामपंथी विचारधारा के लोग बार-बार केवल 5000 साल पुराने समाज की कमजोरियों को गिनाते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि 100 साल पहले अंग्रेजों ने भारत के साथ क्या किया और 500 साल तक चले विदेशी आक्रमणों ने इस देश की आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचाया।

जिस भारत को आज पिछड़ा साबित करने की कोशिश की जाती है, वही भारत कभी विश्वगुरु कहलाता था। यह वही भूमि है जहाँ गुरुकुलों की परंपरा थी, जहाँ विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र और दर्शन अपने उत्कर्ष पर थे। सन 1835 तक भारत में लाखों गुरुकुल होने का उल्लेख विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों में मिलता है। उस समय भारत केवल ज्ञान का केंद्र ही नहीं था, बल्कि विश्व व्यापार का भी सबसे बड़ा आधार था। 1750 में विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 24 प्रतिशत थी, जो अंग्रेजी शासन की नीतियों के कारण 1900 तक घटकर लगभग 1 प्रतिशत रह गई।

यदि भारत में केवल अज्ञान और गरीबी होती, तो दुनिया भर के आक्रमणकारी बार-बार भारत ही क्यों आते? वे हमें समृद्ध बनाने नहीं आए थे, बल्कि भारत की अपार संपदा और ज्ञान को लूटने आए थे।
शिवकर बापूजी तलपड़े और भारत का विमान विज्ञान

आज लोग राइट बंधुओं को विमान का आविष्कारक बताते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 1897 में मुंबई के शिवकर बापूजी तलपड़े ने विमान उड़ाने का सफल प्रयोग किया था। इस ऐतिहासिक घटना को देखने के लिए उस समय के प्रसिद्ध न्यायविद महादेव गोविंद रानाडे, बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ सहित हजारों लोग उपस्थित थे। कहा जाता है कि तलपड़े ने महर्षि भारद्वाज के “विमान शास्त्र” से प्रेरणा लेकर यह प्रयोग किया था।

बाद में अंग्रेजी कंपनियों द्वारा उनसे समझौते किए गए और रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। इसके कुछ वर्षों बाद 1903 में राइट बंधुओं को विमान निर्माण का श्रेय दिया गया। इतिहास के इन पन्नों पर आज भी गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
भारतीय ऋषियों का अद्भुत वैज्ञानिक ज्ञान

भारत का इतिहास केवल आध्यात्म नहीं, बल्कि विज्ञान और शोध का भी इतिहास है।
महर्षि सुश्रुत

महर्षि सुश्रुत को “फादर ऑफ सर्जरी” कहा जाता है। उनकी रचना ‘सुश्रुत संहिता’ में 300 से अधिक शल्यक्रियाओं और 125 से अधिक शल्य उपकरणों का वर्णन मिलता है। प्लास्टिक सर्जरी, मोतियाबिंद, हड्डी जोड़ना और त्वचा प्रत्यारोपण जैसी विधियाँ भारत में सदियों पहले प्रचलित थीं।
आचार्य चरक

आचार्य चरक ने आयुर्वेद को व्यवस्थित रूप दिया। ‘चरक संहिता’ में शरीर विज्ञान, औषधि विज्ञान और रोग उपचार का अद्भुत ज्ञान मिलता है। आज जिन बीमारियों पर आधुनिक चिकित्सा शोध कर रही है, उनके संकेत प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पहले से मौजूद थे।
भास्कराचार्य

भास्कराचार्य ने न्यूटन से कई सदियों पहले गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है।
आचार्य कणाद

आचार्य कणाद ने परमाणु सिद्धांत का उल्लेख उस समय किया, जब दुनिया को परमाणु का ज्ञान भी नहीं था। उन्होंने बताया कि प्रत्येक पदार्थ सूक्ष्म कणों से बना है।
बौद्धायन

बौद्धायन ने ज्यामिति और त्रिकोणमिति के सिद्धांत दिए। पाइथागोरस प्रमेय का उल्लेख भी भारतीय ग्रंथों में पहले से मिलता है।
पतंजलि

योग विज्ञान के माध्यम से शरीर और मन को स्वस्थ रखने की पद्धति महर्षि पतंजलि ने दी। आज पूरी दुनिया योग को स्वीकार कर चुकी है।
मंदिर, स्थापत्य और भारतीय इंजीनियरिंग

भारत में हजारों साल पुराने मंदिर आज भी इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को आश्चर्यचकित करते हैं। बिना आधुनिक मशीनों के इतने विशाल और वैज्ञानिक दृष्टि से संतुलित निर्माण कैसे हुए? यह भारतीय ज्ञान, गणित और स्थापत्य कला की महानता का प्रमाण है।
अंग्रेजों की नीतियाँ और भारत की दुर्दशा

इतिहास यह भी बताता है कि अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों के कारण भारत में भीषण अकाल पड़े और लाखों लोग भूख से मर गए। भारत की उद्योग व्यवस्था को नष्ट किया गया, गुरुकुलों को खत्म किया गया और भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए शिक्षा प्रणाली बदली गई।

सबसे दुखद बात यह रही कि धीरे-धीरे भारतीयों को ही यह विश्वास दिलाया गया कि उनके पूर्वज अज्ञानी थे और सारी प्रगति पश्चिम से आई है।
आत्मगौरव की आवश्यकता

यह सच है कि हर समाज में कुछ कमियाँ रही हैं और भारत भी इससे अलग नहीं था। लेकिन केवल कमजोरियों को दिखाकर पूरे भारतीय इतिहास को झूठा साबित करना भी उचित नहीं है। हमें अपने इतिहास को संतुलित दृष्टि से देखना होगा।

भारत केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरा, विज्ञान, संस्कृति और अध्यात्म का संगम है। आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी अपने इतिहास को जाने, समझे और आत्मगौरव के साथ आगे बढ़े।

जो राष्ट्र अपने इतिहास को भूल जाता है, उसका भविष्य भी धुंधला हो जाता है। इसलिए आवश्यक है कि हम मानसिक गुलामी से बाहर निकलें, अपने ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को पहचानें तथा सत्य को संतुलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करें।
“आधार आपका अधिकार है - सामान खरीदते समय जरूर देखें।”

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