तुम्हारे मृग नयन बन गए चितचोर
कुमार महेंद्रमृगनयनी की एक मुस्कान,
और हृदय के सारे तर्क मौन…
कुछ नयन सचमुच चित चुरा लेते हैं। 💫
“तुम्हारे मृग नयन बन गए चितचोर”
नयन सह नयन मिलन,
नेह-निवेदन स्वीकृत।
मृदुल भाव-तरंगिणी,
उर-आँगन प्रिय अलंकृत।
आनंद-निर्झर बह उठा,
मन हुआ प्रेम-रस विभोर।
तुम्हारे मृग नयन बन गए चितचोर।।
चाल-ढाल हाव-भाव,
अब अनुरागोन्मुख।
पावन भाव-भंगिमा,
प्रिय मिलन हेतु उन्मुख।
जग-विजय भी फीकी लगे,
प्रीत बनी जीवन-डोर।
तुम्हारे मृग नयन बन गए चितचोर।।
विस्मृत हुई निज अस्मिता,
निहारे मदमस्त चक्षु।
रूप-वैभव की पराकाष्ठा,
तर्क-विवेक बने मौन भिक्षु।
रोम-रोम अभिलाष रस,
हृदय हुआ आनंद सराबोर।
तुम्हारे मृग नयन बन गए चितचोर।।
स्वर-व्यंजना विश्रामित,
मौन बना शब्द-कोष।
अंतरपट निर्मल हुआ,
मुस्कान बनी संतोष।
अंतरंग दिव्य प्रेम-सिंधु,
तृप्त हुई मन की हिलोर।
तुम्हारे मृग नयन बन गए चितचोर।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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