दिव्य रश्मि की स्थापना दिवस पर सजा राष्ट्रभक्ति, साहित्य और समाजसेवा का महाकुंभ
सत्येन्द्र कुमार पाठक
पटना की ऐतिहासिक धरती एक बार फिर साहित्य, संस्कृति, राष्ट्रचेतना और सामाजिक समरसता की साक्षी बनी, जब राजधानी के सिन्हा लाइब्रेरी रोड स्थित बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (BIA) सभागार में प्रख्यात सामाजिक-सांस्कृतिक पत्रिका ‘दिव्य रश्मि’ का 12वाँ स्थापना दिवस एवं वीर सावरकर जयंती अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। यह अवसर केवल एक पत्रिका की वर्षगांठ का आयोजन नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, साहित्यिक चेतना और समाज सेवा के विविध आयामों को एक मंच पर प्रतिष्ठित करने वाला ऐतिहासिक समारोह बन गया।
‘दिव्य रश्मि’ द्वारा आयोजित इस भव्य “12वीं वर्षगांठ सम्मान समारोह” में बिहार, हरियाणा, छत्तीसगढ़ तथा उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए 55 विशिष्ट साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों, इतिहासकारों एवं सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में लगे मनीषियों को सम्मानित किया गया। समारोह में उपस्थित विभूतियों को अंगवस्त्र, प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का वातावरण राष्ट्रभक्ति, वैचारिक ऊर्जा और सांस्कृतिक गरिमा से ओत-प्रोत दिखाई दे रहा था।
समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। मुख्य अतिथि बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) अभयानंद, आचार्यकुल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति आचार्य डॉ. धर्मेंद्र, ‘दिव्य रश्मि’ के मुख्य संपादक डॉ. राकेश दत्त मिश्र तथा कमलेश पुण्यार्क “गुरुजी” ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया। दीप प्रज्वलन के साथ ही सभागार में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद की चेतना का वातावरण निर्मित हो गया।
मुख्य अतिथि अभयानंद ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में कहा कि साहित्य और पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली शक्तियाँ हैं। उन्होंने कहा कि एक सशक्त लेखनी समाज को जागृत करने, राष्ट्रभावना को मजबूत करने और आने वाली पीढ़ियों को संस्कारित करने का कार्य करती है। वीर सावरकर के जीवन और उनके राष्ट्रवादी चिंतन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पत्रकारिता और साहित्य को राष्ट्रहित के प्रति अधिक सजग और उत्तरदायी होने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि आज जब समाज अनेक वैचारिक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब ‘दिव्य रश्मि’ जैसी पत्रिकाएँ भारतीयता की चेतना को जीवित रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। अभयानंद ने विशेष रूप से इस बात की सराहना की कि सीमित संसाधनों के बावजूद ‘दिव्य रश्मि’ ने लगातार 12 वर्षों तक सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का दीप प्रज्ज्वलित रखा है।
कार्यक्रम में ‘दिव्य रश्मि’ के मुख्य संपादक डॉ. राकेश दत्त मिश्र ने पत्रिका की 12 वर्षों की संघर्षपूर्ण यात्रा का विस्तृत उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ‘दिव्य रश्मि’ की स्थापना केवल एक पत्रिका निकालने के उद्देश्य से नहीं की गई थी, बल्कि इसका उद्देश्य समाज में भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, अध्यात्म और सामाजिक समरसता के मूल्यों को पुनर्स्थापित करना था।
डॉ. मिश्र ने बताया कि विगत 12 वर्षों में पत्रिका ने अनेक सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर जागरूकता फैलाने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब भौतिकता और बाजारवाद तेजी से बढ़ रहा है, तब भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों को बचाने के लिए वैचारिक पत्रकारिता की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है।
समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों और समाजसेवियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। गोरखपुर से आईं महिला अध्यक्ष डॉ. संध्या त्रिपाठी, आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं वरिष्ठ साहित्यकार-इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक, आरा की प्रख्यात विदुषी तथा अनेक साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्रों में कार्यरत विभूतियों को मंच से विशेष रूप से सम्मानित किया गया।
वक्ताओं ने कहा कि ऐसे सम्मान समारोह उन व्यक्तियों को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं, जो वर्षों से निस्वार्थ भाव से समाज और साहित्य की सेवा में लगे हुए हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि विचार और संस्कार से भी आता है, और इसमें साहित्यकारों तथा पत्रकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
सम्मानित होने वाली प्रमुख विभूतियों में श्री हृदय नारायण झा, श्री लौकिक पारख, श्रीमती नीतू सिंह, पूर्व डीजीपी अभयानंद, डॉ. मदन दुबे, श्री रौशन लाल साहू, श्री विजय जायसवाल, श्री पंकज कुमार मिश्र, श्री राकेश कुमार मिश्र, श्रीमती मीरा प्रकाश, डॉ. मंजू पाण्डेय, छत्तीसगढ़ की डॉ. शीला शर्मा, श्री मार्कण्डेय शारदेय, पूर्वी चंपारण की डॉ. अनिता देवी, लेखक कमलेश पुण्यार्क “गुरुजी”, पटना की डॉ. मीना कुमारी परिहार ‘मान्या’, अनंता कुमारी, भोजपुर जिले की डॉ. रेणु मिश्रा, प्रोफेसर डॉ. सुधा सिन्हा, डॉ. प्रियंका सिन्हा, श्रीमती बिभा कुमारी, डॉ. अंकेश कुमार, श्री शिवानंद गिरि, आदित्य राज, श्री प्रभाकर चौबे, सुरेश चंद पांडेय ‘त्यागी’, अरवल के श्री संजय मिश्र ‘अनु’, रमेश कुमार सुदामा, डॉ. जूली बनर्जी, श्री केशव कुमार, श्रीमती स्वर्णिका मिश्रा, श्री श्याम श्यामल, श्री अमृतेश कुमार शर्मा, श्री संजय कुमार, श्रीमती श्वेता आनंद, साहित्यकार एवं इतिहासकार श्री सत्येंद्र कुमार पाठक, श्रीमती सुनैना सिंह, जीवनधारा नमामि गंगे बिहार राज्य के उपाध्यक्ष डॉ. संगीता सागर, श्रीमती पूजा कुमारी “ऋतुराज”, डॉ. संध्या त्रिपाठी, प्रज्ञा सिंह स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्ष डॉ. उषा श्रीवास्तव, श्री नित्यानंद ओझा, हरियाणा के डॉ. त्रिलोक चंद फतेहपुरी, श्री कृष्णकांत दुबे, डॉ. नीता सहाय, श्रीमती अरुणिमा कुमारी, श्रीमती गीता चौबे, सेवानिवृत्त अपर समाहर्ता दिलीप कुमार अग्रवाल, श्रीमती बबली कुमारी, कृति सुमन, श्री लव कुमार मिश्र, माँ वैष्णो देवी सेवा समिति, पटना तथा सीए डॉ. संजय कुमार झा प्रमुख रूप से शामिल रहे।
कार्यक्रम का एक विशेष आकर्षण प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा और जमीनी समाज सेवा का अद्भुत समन्वय रहा। एक ओर जहाँ पटना के वर्तमान जिलाधिकारी डॉ. त्यागराजन एस.एम. तथा पूर्व डीजीपी अभयानंद जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई, वहीं दूसरी ओर समाज के अंतिम पंक्ति के लोगों की सेवा करने वाली संस्थाओं को भी सम्मानित कर यह संदेश दिया गया कि वास्तविक राष्ट्रनिर्माण सेवा और संवेदना से ही संभव है।
पटना की प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था ‘माँ वैष्णो देवी सेवा समिति’ को उनके स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और मानव सेवा के क्षेत्र में निरंतर किए जा रहे कार्यों के लिए संस्थागत सम्मान प्रदान किया गया। संस्था द्वारा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए चलाए जा रहे सेवा कार्यों की वक्ताओं ने खुलकर सराहना की।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में एक लघु कवि सम्मेलन और वैचारिक गोष्ठी का आयोजन हुआ। इस दौरान सम्मानित कवियों और साहित्यकारों ने राष्ट्रभक्ति, भारतीय संस्कृति, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों पर आधारित अपनी रचनाओं का पाठ किया। कविताओं और वक्तव्यों ने सभागार में उपस्थित लोगों के भीतर राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक गौरव की भावना को और अधिक प्रबल कर दिया।
समारोह के अंत में मुख्य संपादक डॉ. राकेश दत्त मिश्र ने सभी अतिथियों, आगंतुकों, साहित्यकारों, पत्रकारों और देशभर से आए विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ‘दिव्य रश्मि’ का उद्देश्य केवल एक पत्रिका का प्रकाशन नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक चेतना का निर्माण करना है और यह यात्रा भविष्य में भी निरंतर जारी रहेगी।राष्ट्रगान के सामूहिक गान के साथ इस ऐतिहासिक, वैचारिक और भव्य समारोह का गरिमामय समापन हुआ। ‘दिव्य रश्मि’ का यह 12वाँ स्थापना दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, साहित्य और समाजसेवा के समन्वित स्वरूप का जीवंत उदाहरण बन गया, जिसने उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के मन में नई ऊर्जा और प्रेरणा का संचार किया।
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