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नजर

नजर

अरुण दिव्यांश
नजर में नजर है ,
नजर का असर है ,
नजर में नजर का ,
नहीं कोई कसर है ।
नजरों पे किसी की ,
पड़ी यह नजर है ,
तेरी नजर की यह ,
कहाॅं पर बसर है ।
नजर मिल नजर से ,
तो नजरें चल ग‌ईं ,
नजरें हुईं चार तो ,
पकौड़ियाॅं तल गईं ।
नजरों ही नजरों में ,
यह प्यार हो गया ,
दोनों हुए दूजे का ,
अब दिल खो गया ।
बड़ी शातिर नजरें ,
चुरा लेतीं दिल को ,
बना लेतीं जगह ये ,
पहुॅंचा देतीं हिल को ।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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