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"निस्तब्ध अनहद"

"निस्तब्ध अनहद"

पंकज शर्मा
नभ के निर्जन नील कक्ष में
कौन अलक्षित गान बसा है?
किस अदृश्य अधर की कंपन
बनकर प्राणों में हँसा है?
जहाँ न स्वर का जन्म हुआ है,
वहीं मौन मधुमय वाणी है।


अंबर की श्यामल पलकों पर
स्वप्निल धूलि बिखर जाती है,
चेतन की गहराती सरिता
अंतस में ही उतर जाती है।
विस्मृत क्षितिजों के उस पार
एक अकथ आलोक धरा है।


जब थककर लौटे विचारों के
पथिक, शून्य के आँगन में,
तब कोई छाया-सी चुपचाप
दीप जला दे अंतर्मन में।
निश्शब्द दिशाओं के भीतर
अनुगूँजित जीवन-सरिता है।


नभ के सूने विस्तारों में
मैंने स्वयं को खोया है,
रेतिल समय की करवट पर
क्षण-क्षण का बंधन धोया है।
तब जाना—रिक्त नहीं होता
जो सबसे अधिक अकेला है।


ध्यान-निमीलित उस क्षण में जब
मन का कंपन रुक जाता,
अंतर का निष्पंद कमल तब
अनजाने ही खिल जाता।
वहाँ न पीड़ा शेष बचती,
न कोई मोहिल माया है।


शून्य नहीं वह—एक अनश्वर
सांसों का गुप्त समर्पण है,
जहाँ स्वयं से मिल जाने का
निर्मलतम आत्मार्पण है।
उस मौन अनादि संगीत में
जीवन का सत्य निहित सारा है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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