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मनुस्मृति और भारत का सर्वोच्च न्यायालय

मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग - 13 ख

मनुस्मृति और भारत का सर्वोच्च न्यायालय

संविधान में न्यायाधीशों की योग्यता
राकेश कुमार आर्य
भारत में सर्वोच्च संवैधानिक न्यायालय के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना तो की गई है, परंतु उसके न्यायाधीशों के लिए योग्यताओं में उन योग्यताओं को सम्मिलित नहीं किया गया है जो महर्षि मनु के द्वारा अपने समय में स्थापित की गई थीं। सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख कार्य हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा करना होता है, किंतु ऐसे अनेक प्रकरण देखने सुनने को मिलते हैं जब न्यायालय के माध्यम से ही व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता हुआ दिखाई देता है। आज समाज में व्यक्ति के नैतिक आचरण का पतन हुआ है। सामाजिक जटिलताएं और विसंगतिया इतनी अधिक बढ़ गई हैं कि लोग छोटी-छोटी बातों पर न्यायालय के दरवाजे खटखटाते हैं। इसका कारण केवल एक है कि लोग विधि, कानून-व्यवस्था और धर्म का पालन करने में लापरवाही दिखाते हैं। जातीय संघर्ष अपने चरम पर है। जातीय आधार पर लोग एक दूसरे के से द्वेष - भावना रखते हैं। संविधान के लिए बार-बार यह दवाई दी जाती है कि यह संविधान सामाजिक समरसता पैदा करने के लिए बनाया गया है, परंतु इसी की नाक तले सामाजिक विषमताएं बढ़ती जा रही है। सर्वत्र इसी प्रकार की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। शिक्षा के माध्यम से जो विचार परोसे जा रहे हैं उनसे भी मानव की स्वार्थवादी प्रवृत्ति अधिक प्रकट होती है।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई का कथन

वर्तमान न्याय प्रणाली के दोषों पर विचार व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने लंबित मामलों और उनमें हो रही देरी की समस्या पर कहा था कि भारत की जिला अदालतों में लगभग 26.8 करोड़ वाद लंबित हैं। यह तभी संभव हुआ है जब न्यायालय में पड़े मामलों में देरी से सुनवाई की जाती है। प्रक्रिया को लंबा खींचा जाता है। इसमें न्याय विभाग के कर्मचारियों के साथ-साथ अधिवक्ताओं का भी योगदान होता है। अधिवक्ताओं की हड़ताल और कार्य के प्रति समर्पण के अभाव के कारण मामलों को लटकाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। रंजन गोगोई ने अपने उपरोक्त भाषण में यह भी बताया कि लंबित मामलों में देश के उच्च न्यायालयों में 44 लाख मामले लंबित हैं। इन आंकड़ों से यह भी सिद्ध होता है कि जब मनुष्य का नैतिक पतन होता है तो वाद विवाद और झगड़े फसाद बढ़ते हैं। जिनका निस्तारण करने में समस्या आती है और जब निस्तारण करने वाले भी कहीं ना कहीं शक के घेरे में आते हैं तो स्थिति और भी भयंकर हो जाती है।
ऐसी स्थिति में समस्याओं का एक विस्फोट होता है । जिससे न्यायिक अराजकता फैल जाती है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि इस समय जितना बोझ न्यायालयों पर वाद पत्रावलियों को बना हुआ है, यदि उनमें और अधिक वृद्धि न हो अर्थात इतने पर ही वाद- पत्रावलियां रुकी रहें तो इनका निस्तारण करने में भी न्यायालयों को लम्बी अवधि लग जाएगी। जहां मनु महाराज के समय में न्यायालयों के लिए अलग किसी प्रकार के ढांचे की आवश्यकता नहीं होती थी, वहीं आज की समस्याओं के दृष्टिगत न्यायालयों के बुनियादी ढांचे की भी आवश्यकता अनिवार्य हो गई है। इस पर न्यायमूर्ति रंजन गोगोई का कहना है कि " सहायता के बिना, न्यायिक लंबित मामलों, जिनमें दिल्ली उच्च न्यायालय से संबंधित आपराधिक अपीलें भी शामिल हैं, को हल करने में पीढ़ियां लग जाएंगी। इसके अलावा, न्यायपालिका में बुनियादी ढांचे की कमी और रिक्तियां हैं। प्रणाली में कर्मचारियों की भारी कमी है, उच्च न्यायालय के 900 न्यायाधीशों में से 250 पद खाली हैं और अन्य अदालतों में 3,000 न्यायाधीशों की कमी है। अमेरिका जैसे अन्य देशों की तुलना में, जहां प्रति दस लाख पर 130 न्यायाधीश हैं, भारत में प्रति दस लाख पर न्यायाधीशों का अनुपात 15.4 न्यायाधीश है, जो नगण्य है। इन कमियों के कारण देरी और अक्षमताएं और भी बदतर हो जाती हैं।"

न्यायमूर्ति नजीर का कथन

कुछ समय पहले न्यायमूर्ति नजीर ने कहा था कि महर्षि मनु जैसे भारतीय विद्वानों के द्वारा जो न्याय प्रणाली विकसित की गई थी, वही वास्तविक अर्थो में न्याय प्रदान करने वाली न्याय प्रणाली कहीं जा सकती है।30 दिसंबर 2021 को ' सनातन प्रभात ' में छपी एक खबर के अनुसार कानून के विद्यार्थियों को अब पूंजीवादी भूमिका से बाहर निकलने की आवश्यकता है । मनु, चाणक्य और बृहस्पति द्वारा विकसित की हुई पुरातन भारतीय न्याय व्यवस्था ही भारत के लिए योग्य है, अखिल भारतीय अधिवक्ता महासंघ की राष्ट्रीय परिषद में बोलते हुए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अब्दुल नजीर ने यह मत व्यक्त किया ।
न्यायमूर्ति नजीर ने आगे कहा कि,
१. जब भारत में पश्चिमी न्यायशास्त्र लागू किया गया, तब केवल सत्ताधारी वर्ग को न्याय उपलब्ध हुआ । सामान्य व्यक्ति न्याय नही मांग सकता । प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति किसी भी बात के विरुद्ध न्याय मांग सकता है ।
२. न्याय व्यवस्था में भारतीयकरण के लिए प्रयास करने चाहिए । अब आधुनिक न्यायशास्त्र के स्थान पर भारत की प्राचीन न्यायशास्त्र द्वारा बताए विचारों की ओर ध्यान देना चाहिए । कानून का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए प्राचीन भारतीय न्याय प्रणाली अनिवार्य विषय के रुप में सम्मिलित करना चाहिए । प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था में, कोई व्यक्ति किसी भी बात के विरुद्ध न्याय मांग सकता है । राजाओं को भी कानून के राज्य के आगे झुकना पडा था । सत्ताधारी वर्ग के विरोध में भी न्याय मांगने का अधिकार था ।
३. पश्चिमी विचार, यह अधिकारों के विषय में है, तो भारतीय विचार, यह दायित्व पर आधारित है ।
४. प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था में कोई व्यक्ति जितना अधिक दायित्व स्वीकार करेगा, उतनी मात्रा में उसे अधिकार दिये जाते थे । अधिकार यह दायित्व निभाने के साधन थे ।
५. पश्चिमी न्यायशास्त्र अलग है । पश्चिमी न्याय व्यवस्था में दायित्वों पर बहुत कम जोर दिया जाता है । इस व्यवस्था में अधिकार को प्रधानता दी जाती है । इस व्यवस्था में नागरिकों को अपने अधिकार पाने के लिए अपने दायित्व निभाने चाहिए, ऐसी आवश्यकता नहीं । इसका विवाह जैसी सामाजिक संस्थापर महत्वपूर्ण परिणाम होता है ।
६. भारतीय न्यायशास्त्रानुसार विवाह एक कर्तव्य है । अनेक सामाजिक कर्तव्यों में से विवाह भी एक कर्तव्य है, जो सभी को निभाना चाहिए; परंतु पश्चिमी न्यायशास्त्र के अधिकारों के कारण विवाह की ओर एक संधि की भांति देखा जाता है । इस संधि से प्रत्येक जोडीदार उसको या उसे संभव जितना मिल सके पाने का प्रयास करता है । *तलाक की उच्च दर* यह विवाह के कर्तव्य के पहलू की और दुर्लक्ष करने का परिणाम है । (३०.१२.२०२१ , सनातन प्रभात से साभार )

( डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लेखक की पुस्तक "मनुस्मृति और भारतीय संविधान" से )

( लेखक  राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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