नेपाल में सनातन चेतना का उदय: नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय में धर्म, अध्यात्म एवं राष्ट्र विषयक भव्य संगोष्ठी संपन्न

नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय के वाल्मीकि विद्यापीठ में धर्म, अध्यात्म एवं राष्ट्र विषय पर एक भव्य एवं वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यापीठ के प्राचार्य प्रोफेसर डॉ. अच्युत लामिछाने ने की। इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोधार्थी एवं छात्र उपस्थित रहे, जिन्होंने सनातन संस्कृति, राष्ट्रचेतना और आध्यात्मिक मूल्यों पर गहन विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंगलाचरण एवं मंत्रोच्चारण के साथ हुआ, जिससे पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा और भारतीय सनातन परंपरा की दिव्यता से ओत-प्रोत हो उठा। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में प्रेमचंद्र झा उपस्थित रहे, जो गोवर्धन पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य गोवर्धन पीठाधीश्वर महाराज जी के कृपापात्र शिष्य हैं।
अपने ओजस्वी एवं प्रेरणादायी संबोधन में श्री प्रेमचंद्र झा ने सनातन धर्म की गौरवशाली परंपरा, उसके सांस्कृतिक मूल्यों तथा वर्तमान समय में उसकी रक्षा की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गोवर्धन पीठ द्वारा सनातन धर्म के मानबिंदुओं की रक्षा एवं हिंदू समाज को संगठित करने के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने उपस्थित विद्यार्थियों एवं विद्वानों से आह्वान किया कि नेपाल को पुनः हिंदू राष्ट्र घोषित कराने के लिए जन-जागरण अभियान को गति प्रदान करें।
उन्होंने कहा कि पूज्य शंकराचार्य जी महाराज का स्पष्ट संदेश है कि भारत के हिंदू राष्ट्र घोषित होने से पूर्व नेपाल को हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित करना आवश्यक है, क्योंकि नेपाल विश्व का एकमात्र ऐसा राष्ट्र रहा है जिसकी पहचान आधिकारिक रूप से हिंदू राष्ट्र के रूप में रही है। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन संस्कृति केवल आस्था नहीं, बल्कि मानवता, नैतिकता और वैश्विक कल्याण का आधार है।
संगोष्ठी में उपस्थित प्राध्यापकों एवं छात्रों ने एक स्वर में यह संकल्प व्यक्त किया कि वे पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के संदेश एवं अभियान को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य करेंगे। विद्यार्थियों ने कहा कि नेपाल की सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को आगे आना होगा।
इस अवसर पर न्याय एवं दर्शन विभाग के महान दार्शनिक प्रोफेसर डॉ. बैकुंठ धीमीरे, प्रोफेसर डॉ. केशव शरण आर्याल, प्रोफेसर डॉ. राम प्रसाद पोडेल तथा प्रोफेसर डॉ. कल्पना कुमारी झा सहित अन्य विद्वानों ने श्री प्रेमचंद्र झा का पारंपरिक तरीके से भव्य स्वागत एवं अभिनंदन किया। वक्ताओं ने कहा कि धर्म और अध्यात्म समाज को नैतिक दिशा प्रदान करते हैं तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रोफेसर डॉ. तेज विलास अधिकारी, प्रोफेसर डॉ. नवीन कुमार मिश्रा, प्रोफेसर डॉ. चिंतामणि भट्टराई, प्रोफेसर डॉ. कृष्ण प्रसाद, टेक नाथ दाहाल, प्रत्यूष काफिले, रमेश श्रेष्ठ, शिशिर शपकोटा, दर्शन पेरु, तेजेंद्र तथा सूडन बहादुर श्रेष्ठ सहित अनेक प्राध्यापक एवं छात्रों की सक्रिय भूमिका रही।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर डॉ. अच्युत लामिछाने ने कहा कि सनातन संस्कृति मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन में कार्य करने की इच्छा जताई। साथ ही उन्होंने भविष्य में पुरी जाकर शंकराचार्य जी से प्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त करने की भी कामना व्यक्त की।संगोष्ठी का समापन राष्ट्र, धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। कार्यक्रम ने नेपाल के बौद्धिक एवं शैक्षणिक जगत में सनातन चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता एवं राष्ट्रवाद को लेकर नई ऊर्जा का संचार किया।
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