"मन की अनकही प्रतिध्वनियाँ"
पंकज शर्मा
एकाकीपन केवल बाहरी संसार की रिक्तता नहीं, बल्कि भीतर उमड़ते उन भावों का मौन है जिन्हें शब्दों का आश्रय नहीं मिल पाता। मनुष्य भीड़ में रहकर भी अकेला हो जाता है, जब उसकी संवेदनाएँ अनसुनी रह जाती हैं। आत्मा की सबसे गहरी अनुभूतियाँ अक्सर होंठों तक आते-आते ठिठक जाती हैं और यही मौन धीरे-धीरे अंतर्मन में अंधकार भर देता है।
किन्तु जीवन का सत्य यह है कि अभिव्यक्ति ही आत्मा की मुक्ति है। जब कोई मनुष्य साहसपूर्वक अपने मन की सच्चाइयों को स्वीकारता और प्रकट करता है, तब भीतर का बोझ हल्का होने लगता है। संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि हृदयों के बीच विश्वास का सेतु है। जो अपने मन की रोशनी बाँटना सीख लेता है, उसका एकाकीपन भी आत्मबल में परिवर्तित हो जाता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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