मंत्रिमंडल विस्तार में एक वर्ग की हुई उपेक्षा - लोगों में बढ़ी नाराजगी.jpeg)
दिव्य रश्मि के उपसंपादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से।.jpeg)
बिहार में हुए मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड ने अपने-अपने स्तर पर सामाजिक संतुलन बनाने का प्रयास किया है। भाजपा ने सवर्ण, अति पिछड़ा, दलित और महिला चेहरों को जगह देकर व्यापक सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश की, वहीं जदयू ने मुस्लिम, महादलित, महिला और अति पिछड़ा वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर अपनी पारंपरिक सामाजिक इंजीनियरिंग को बनाए रखने का संदेश दिया है। लेकिन इन सभी समीकरणों के बीच कायस्थ समाज की अनदेखी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
पटना उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कुमार सिन्हा ने बताया कि बंगाल चुनाव में कायस्थो की प्रबल भागीदारी और भाजपा को मिले अपार जन समर्थन में कायस्थ की भूमिका ने पूरे चुनाव परिणाम को बदल कर रख दिया। कायस्थ ने 15 साल के तृणमूल शासनकाल को उखाड़ कर फेंक दिया। ऐसे कायस्थ को बिहार की एनडीए सरकार ने धत्ता दिखा दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार सिन्हा उर्फ मुकेश महान ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए कहा है कि दोनों प्रमुख दलों ने कायस्थ समाज को प्रतिनिधित्व देने में पूरी तरह उपेक्षित कर दिया है।
वहीं जीकेसी के ग्लोबल उपाध्यक्ष सह बिहार प्रदेश अध्यक्ष दीपक कुमार अभिषेक ने मुद्दे को बहुत गंभीर बताते हुए कहा है कि मंत्रिमंडल में कायस्थ समाज को प्रतिनिधित्व न देकर पूरी तरह उपेक्षित कर दिया है। इससे समाज के लोगों में गहरी नाराजगी है और वे अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि बिहार की राजनीति में कायस्थ समाज की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। प्रशासनिक दक्षता, शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता और राजनीतिक जागरूकता के कारण यह समाज लंबे समय से प्रभावशाली माना जाता रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक राजनीति तक अनेक कायस्थ नेताओं ने राज्य और देश की राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके बावजूद हाल के वर्षों में राजनीतिक दलों द्वारा इस समाज को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की शिकायत लगातार बढ़ती जा रही है। समाज के लोगों का कहना है कि चुनावों के दौरान उनसे समर्थन तो लिया जाता है, लेकिन सत्ता में भागीदारी के समय उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों पर काफी हद तक आधारित रही है। इसी कारण दल उन वर्गों को प्राथमिकता देते हैं जिनकी जनसंख्या अधिक है और जो चुनावी परिणामों को सीधे प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा ने इस बार विभिन्न जातीय समूहों को साधने के लिए कई नए चेहरों को शामिल किया। वहीं जदयू ने अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति अपनाई। कायस्थ समाज के लोगों का तर्क है कि प्रतिनिधित्व केवल संख्या के आधार पर नहीं होना चाहिए। शिक्षा, प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक योगदान को भी महत्व दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि अगर अन्य छोटे समुदायों को जगह दी जा सकती है, तो कायस्थ समाज की उपेक्षा उचित नहीं है।
कायस्थ समाज के बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे पर खुलकर नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि बिहार में लंबे समय से कायस्थ समाज भाजपा और जदयू का समर्थक रहा है, लेकिन बदले में उन्हें राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं मिली।
दीपक अभिषेक ने कहा कि समाज के लोगों में यह भावना तेजी से बढ़ रही है कि उनकी निष्ठा और योगदान की अनदेखी की जा रही है। वहीं अधिवक्ता संजय कुमार सिन्हा का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी वर्गों को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार मुकेश महान ने भी कहा कि लगातार उपेक्षा से समाज में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार जैसे राज्य में कोई भी वर्ग पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भले ही किसी समाज की संख्या कम हो, लेकिन उसकी सामाजिक और बौद्धिक उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है। कायस्थ समाज परंपरागत रूप से शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक माना जाता है। ऐसे में उनकी नाराजगी भविष्य में राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि राजनीतिक दल समय रहते इस असंतोष को नहीं समझेंगे, तो इसका असर चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है। आज के दौर में सोशल मीडिया और सामाजिक संगठनों के माध्यम से छोटे समुदाय भी अपनी आवाज प्रभावी ढंग से उठा रहे हैं।
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि हर वर्ग को सम्मान और भागीदारी मिले। केवल चुनावी गणित के आधार पर राजनीति करने से समाज में असंतोष पैदा होता है। बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय और संतुलन की बात लंबे समय से होती रही है, लेकिन वास्तविक सामाजिक संतुलन तभी संभव है जब सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिले।
कायस्थ समाज की नाराजगी इस बात का संकेत है कि राजनीतिक दलों को केवल बड़े वोट बैंक ही नहीं, बल्कि उन समुदायों पर भी ध्यान देना होगा जिन्होंने वर्षों तक राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा और जदयू इस नाराजगी को दूर करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
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