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देवों के महान चिकित्सक अश्विनी कुमार

देवों के महान चिकित्सक अश्विनी कुमार

सत्येंद्र कुमार पाठक
: वैदिक चेतना में आरोग्यता के आदि-प्रतीक में सनातन धर्म और वैदिक वांग्मय में स्वास्थ्य, दीर्घायु और कायाकल्प की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितनी स्वयं यह सृष्टि है। इस दिव्य आरोग्य विज्ञान के मूल संवाहक और अधिष्ठाता देवों के परम चिकित्सक 'अश्विनी कुमार' हैं। ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर, पुराणों की कथाओं, महाभारत के इतिहास और उपनिषदों के दार्शनिक विवेचनों तक अश्विनी कुमारों की महिमा सर्वत्र व्याप्त है। इन्हें केवल देवताओं का वैद्य (Physician of Gods) ही नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का प्रथम शल्य-चिकित्सक (Surgeon), जड़ी-बूटियों का अन्वेषक, और मानव व देव दोनों संस्कृतियों के बीच आरोग्य का सेतु माना गया है। अश्विनी कुमार दो जुड़वां भाई हैं, जिन्हें 'नासत्य' और 'दस्र' के नाम से जाना जाता है। वे भोर (प्रभात) के देवता हैं, जो अंधकार रूपी व्याधि को मिटाकर प्रकाश रूपी स्वास्थ्य का संचार करते हैं। प्रस्तुत विस्तृत आलेख में उनके जन्म के दिव्य रहस्यों, आयुर्वेद में उनके अतुलनीय योगदान, वैश्विक संस्कृतियों में उनकी उपस्थिति, तथा प्राचीन भारतीय जनपदों—जैसे कीकट, मगध, कारुष और हिरण्य प्रदेशों के साथ उनके परोक्ष व प्रत्यक्ष संबंधों का प्रामाणिक व शोधपरक अनुशीलन किया गया है।
अश्विनी कुमारों के जन्म की कथा जितनी दिव्य है, उतनी ही ब्रह्मांडीय और प्रतीकात्मक भी है। विभिन्न पुराणों, विशेषकर विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और मार्कण्डेय पुराण में इनकी उत्पत्ति का सविस्तार वर्णन मिलता ह
भगवान सूर्यदेव का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा (जिन्हें 'सरन्यु' या 'सहाय' भी कहा गया है) से हुआ था। सूर्यदेव का तेज इतना प्रचंड और जाज्वल्यमान था कि माता संज्ञा उनके स्वरूप को सीधे देखने या उनके समीप रहने में असमर्थ थीं। सूर्य के इस असहनीय तेज और ऊष्मा के कारण संज्ञा ने अपनी छाया (सुवर्णा) को अपने रूप में स्थापित किया और स्वयं सूर्यदेव को बिना बताए पृथ्वी पर तपस्या करने चली गईं। संज्ञा ने तपस्या के लिए 'उत्तर कुरु' क्षेत्र को चुना। पौराणिक और भौगोलिक दृष्टि से उत्तर कुरु हिमालय के उत्तर में स्थित एक अत्यंत पवित्र, आध्यात्मिक और दिव्य क्षेत्र माना गया है। इस क्षेत्र की विशेषता यह थी कि यहाँ प्रकृति सदैव सौम्य रहती थी, और वहाँ के निवासी कभी बूढ़े, बीमार या दुखी नहीं होते थे। इसी परम शांत और शीतल वातावरण में माता संज्ञा ने सूर्य के तेज को सहन करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए एक घोड़ी (अश्विनी) का रूप धारण किया और मौन तपस्या में लीन हो गईं।
जब सूर्यदेव को योगबल से ज्ञात हुआ कि उनके समीप रहने वाली स्त्री संज्ञा नहीं बल्कि उनकी छाया है, तो वे असली संज्ञा की खोज में पृथ्वी की ओर बढ़े। उन्होंने देखा कि उत्तर कुरु के दिव्य मैदानों में संज्ञा घोड़ी के रूप में घास चर रही थी और तप कर रही थी। संज्ञा के समीप जाने और उनके तेज को संतुलित करने के लिए सूर्यदेव ने भी एक अत्यंत सुंदर और बलवान अश्व (घोड़े) का रूप धारण कर लिया। इस उत्तर कुरु क्षेत्र में, अश्व रूपी सूर्यदेव और अश्विनी रूपी संज्ञा के अलौकिक आध्यात्मिक मिलन से संज्ञा के नासिका छिद्रों (Nostrils) के माध्यम से दो परम तेजस्वी जुड़वां बालकों का प्राकट्य हुआ। घोड़े (अश्व) के स्वरूप से उत्पन्न होने के कारण ही इन जुड़वां भाइयों का नाम 'अश्विनी कुमार' या 'अश्विनौ' पड़ा। बड़े भाई का नाम 'नासत्य' (जिसका अर्थ है जो कभी असत्य नहीं बोलता या जिसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता) और छोटे भाई का नाम 'दस्र' (जिसका अर्थ है शत्रुओं और रोगों का नाश करने वाला, अद्भुत कर्म करने वाला)। पत्नियों का विवरण: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, बड़े भाई नासत्य का विवाह 'ज्योति' से और छोटे भाई दस्र का विवाह 'मायान्द्री' से हुआ था। इसके अतिरिक्त, ऋग्वेद के 10वें मण्डल के विवाह सूक्त (10.85) में उल्लेख आता है कि सूर्य की पुत्री 'सूर्या' ने दोनों अश्विनी कुमारों को वरण किया और वे उनके त्रिचक्र रथ की सह-यात्री बनीं, जिन्हें उनकी दिव्य संगिनी माना जाता है।: इनके दो प्रमुख पुत्र माने गए हैं—सत्यवीर और दमराज। महाभारत काल में द्वापर युग में, जब राजा पाण्डु की द्वितीय पत्नी माद्री ने महर्षि दुर्वासा द्वारा दिए गए 'सद्गति मंत्र' से इनका आह्वान किया, तब नासत्य के अंश से नकुल और दस्र के अंश से सहदेव का जन्म हुआ। इन्हें इनके पिता के नाम पर 'अश्विनेय' भी कहा जाता है। नकुल को अश्वों (पशुओं) की चिकित्सा का और सहदेव को तंत्र, ज्योतिष एवं मानव आयुर्वेद का विलक्षण ज्ञान अपने दिव्य पिताओं से प्राप्त हुआ था।
'अश्विनीकुमार संहिता' और चमत्कारी शल्य-चिकित्सा के अनुसार चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अश्विनी कुमारों की स्थिति सनातन इतिहास में सर्वोच्च पीठ के समान है। वे केवल औषधियों के ज्ञाता नहीं थे, बल्कि वे सृष्टि के प्रथम 'प्लास्टिक सर्जन' और 'ऑर्गन ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ' थे। आयुर्वेद के अवतरण की परंपरा के अनुसार, ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के साथ ही एक लाख श्लोकों और आठ अंगों वाले आयुर्वेद का स्मरण किया था। ब्रह्मा जी से यह पूर्ण ज्ञान दक्ष प्रजापति ने प्राप्त किया। दक्ष प्रजापति से इस संपूर्ण ज्ञान को ग्रहण करने वाले सर्वप्रथम मुख्य शिष्य स्वयं अश्विनी कुमार थे। दोनों भाइयों ने इस ज्ञान को न केवल कंठस्थ किया, बल्कि इसका व्यावहारिक, प्रयोगात्मक और वैज्ञानिक वर्गीकरण किया। 'अश्विनीकुमार संहिता' की रचना चिकित्सा और शल्यकर्म को लिपिबद्ध और व्यवस्थित करने के लिए दोनों भाइयों ने 'अश्विनीकुमार संहिता' नामक एक महान ग्रंथ की रचना की। इस संहिता में कायाकल्प, नेत्र चिकित्सा, अस्थि संधान (हड्डियों को जोड़ना), प्रसूति तंत्र, और विष विज्ञान (Toxicology) पर विस्तृत सूत्र दिए गए थे। यद्यपि कालक्रम में यह मूल संहिता लुप्तप्राय हो गई, परंतु इसके संदर्भ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम् में प्रचुरता से मिलते हैं।
ऋग्वेद और विभिन्न ब्राह्मण ग्रंथों में अश्विनी कुमारों द्वारा किए गए ऐसे शल्य-कर्मों का विवरण है जो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को भी विस्मय में डाल देते हैं: खेल राजा की पुत्री 'विष्पला' का कृत्रिम पैर: युद्ध में रानी या राजकुमारी विष्पला का पैर कट गया था। अश्विनी कुमारों ने रात के समय ही उनके कटे पैर के स्थान पर लोहे का कृत्रिम पैर (Iron Prosthetic Leg) लगा दिया, जिससे वे पुनः चलने और युद्ध करने में सक्षम हो गईं। यह इतिहास का प्रथम दर्ज 'प्रोस्थेटिक शल्य-कर्म' है। ऋषि च्यवन का कायाकल्प: भृगुवंशी महर्षि च्यवन अत्यंत वृद्ध, जर्जर और अंधे हो चुके थे। अश्विनी कुमारों ने औषधीय काढ़े और रसायनों की मदद से न केवल उनकी आँखों की ज्योति वापस लौटाई, बल्कि उन्हें 16 वर्ष के नवयुवक के समान चिर-यौवन और कांति प्रदान की।
कटे सिर को जोड़ना (दध्यंग अथर्वण ऋषि): महर्षि दधीचि (दध्यंग) को इंद्र ने श्राप दिया था कि यदि वे किसी को मधुविद्या (ब्रह्मविद्या) सिखाएंगे, तो उनका सिर काट दिया जाएगा। अश्विनी कुमारों ने ब्रह्मविद्या सीखने के लिए पहले दधीचि का सिर काटकर सुरक्षित रख दिया और उनके धड़ पर एक घोड़े का सिर लगा दिया। जब घोड़े के मुख से दधीचि ने विद्या दे दी, तो इंद्र ने उनका सिर काट दिया। तत्पश्चात, अश्विनी कुमारों ने घोड़े का सिर हटाकर ऋषि का मूल मानव सिर वापस धड़ से कुशलतापूर्वक जोड़ दिया।
. च्यवन ऋषि की कथा और सोमरस के अधिकार का संघर्ष - अश्विनी कुमारों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ सोमरस (देवताओं के पेय) की प्राप्ति का संघर्ष है। देवताओं के चिकित्सक होने के बावजूद, देवराज इंद्र उन्हें यज्ञ में भाग लेने और सोमरस पीने का अधिकार नहीं देते थे। इंद्र का तर्क था कि चूंकि अश्विनी कुमार पृथ्वी पर मनुष्यों, पशुओं और सामान्य जीवों की चिकित्सा करते हैं, और रोगियों के संपर्क में आते हैं, इसलिए वे देवताओं की शुद्ध पंक्ति में बैठने के अधिकारी नहीं हैं। कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि को आंवला वृक्ष की छाया में दान एवं सगे संबंधियों के साथ परिवार सहित भोजन करने से निरोगता मिलती है।
च्यवनप्राश का निर्माण और कायाकल्प - जब अश्विनी कुमार पृथ्वी के भ्रमण पर थे, तब उनकी भेंट राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या और उनके वृद्ध पति च्यवन ऋषि से हुई। सुकन्या की पतिभक्ति से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमारों ने च्यवन ऋषि के कायाकल्प का निर्णय लिया। उन्होंने पृथ्वी की अत्यंत दुर्लभ जड़ी-बूटियों, मुख्य रूप से आँवला (आमलकी), अष्टवर्ग के पौधों, गिलोय, और अन्य दिव्य रसायनों को मिलाकर एक महा-औषधि तैयार की।।दोनों भाइयों ने च्यवन ऋषि को एक पवित्र सरोवर में स्नान कराया और इस औषधि का सेवन कराया। च्यवन ऋषि तुरंत रोगमुक्त होकर युवा हो गए। इसी दिव्य योग को आज हम संसार में 'च्यवनप्राश' के नाम से जानते हैं।
कृतज्ञ च्यवन ऋषि ने अश्विनी कुमारों को उनका न्यायोचित अधिकार दिलाने की प्रतिज्ञा की। उन्होंने राजा शर्याति के माध्यम से एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ में च्यवन ऋषि ने जैसे ही अश्विनी कुमारों को सोमरस का भाग अर्पित किया, देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने वज्र उठा लिया। महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से इंद्र के हाथ को वहीं स्तंभित (जाम) कर दिया और यज्ञ की अग्नि से 'मद' नामक एक भयंकर असुर को उत्पन्न किया, जो इंद्र को निगलने दौड़ा। भयभीत होकर इंद्र ने अपनी भूल स्वीकार की और अश्विनी कुमारों की दिव्यता, पवित्रता और उनके परम वैद्य स्वरूप को स्वीकार करते हुए उन्हें यज्ञ में सोमरस पीने का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्रदान किया।
ऋग्वेद के 376 संदर्भ के अनुसार वैदिक साहित्य में अश्विनी कुमारों का स्थान अद्वितीय है। वे केवल उत्तर-वैदिक काल के पौराणिक पात्र नहीं हैं, बल्कि विशुद्ध रूप से ऋग्वेद के प्रमुख सूक्तों के नायक हैं। ऋग्वेद में 376 बार उल्लेख: ऋग्वेद में अग्नि, इंद्र और सोम के बाद जिन देवताओं की स्तुति सबसे अधिक की गई है, उनमें अश्विनी कुमार प्रमुख हैं। पूरे ऋग्वेद में 376 बार उनका आवाहन किया गया है। उनके लिए समर्पित सूक्तों की संख्या लगभग 50 से अधिक है। सदैव द्विवचन का प्रयोग ('अश्विनौ'): ऋग्वेद की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसमें दोनों कुमारों के अलग-अलग नाम (नासत्य और दस्र) स्वतंत्र रूप से बहुत कम आते हैं। सर्वत्र दोनों को एक साथ द्विवचन (Dual Form) में 'अश्विनौ' या 'अश्विनीकुमारौ' कहकर ही पुकारा गया है। यह इस बात का प्रतीक है कि चिकित्सा विज्ञान में 'ज्ञान' (नासत्य) और 'क्रिया/शल्यकर्म' (दस्र) दोनों का एक साथ होना अनिवार्य है; दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। प्रभात और प्रकाश के देवता: वेदों में इन्हें 'मधुयुवा' और 'हिरण्यवर्तनी' कहा गया है। वे सोने के बने त्रिचक्र (तीन पहियों वाले) रथ पर सवार होकर आकाश मार्ग से चलते हैं। वे रात्रि के अंधकार को चीरते हुए सूर्य से ठीक पहले प्रकट होते हैं, जिसे भोर या 'उषा काल' कहा जाता है। आध्यात्मिक रूप से वे अज्ञान और व्याधि के अंधकार को नष्ट करने वाले प्रकाशपुंज हैं।
. आंवला वृक्ष की पौराणिक उत्पत्ति एवं चिकित्सा महत्व - अश्विनी कुमारों की चिकित्सा पद्धति में आँवला (आमलकी) को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। इसे शास्त्रों में 'धात्री फल' (माता के समान पालन करने वाला) और 'अमृत फल' कहा गया है। आंवला वृक्ष की उत्पत्ति का रहस्य - पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अंतर्गत कार्तिक महात्म्य में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति की कथा आती है। सृष्टि के प्रारंभ में, जब भगवान ब्रह्मा परब्रह्म नारायण की साधना और तपस्या में लीन थे, तब गहन भक्ति के कारण उनके नेत्रों से आनंद और प्रेम के अश्रु छलक पड़े। ब्रह्मा जी के ये दिव्य अश्रु जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वहाँ-वहाँ एक अत्यंत गुणकारी, पवित्र और औषधीय वृक्ष का प्राकट्य हुआ, जिसे आँवला का वृक्ष कहा गया। चूंकि यह ब्रह्मा के आंसुओं (चेतना के रस) से जन्मा था, इसलिए इसमें बुढ़ापे को रोकने और जीवन को नव-ऊर्जा देने की असीम क्षमता थी।।आंवले का औषधीय प्रयोग जब अश्विनी कुमारों को च्यवन ऋषि के कायाकल्प के लिए रसायन बनाना था, तब।उन्होंने देखा कि पृथ्वी पर उपलब्ध सभी वनस्पतियों में आँवला ही एकमात्र ऐसा फल है जिसमें पंचरस (मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त, कषाय) विद्यमान हैं और जो त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को एक साथ शांत कर सकता है। अश्विनी कुमारों ने आंवले को मुख्य आधार बनाकर उसे अन्य अष्टवर्ग की जड़ी-बूटियों के साथ पकाकर 'रसायन' की विधा खोजी। इसी कारण, आयुर्वेद में आंवले को साक्षात अश्विनी कुमारों के आशीर्वाद का स्वरूप माना जाता है।
भौगोलिक एवं प्रांतीय अंतर्संबंध: कीकट, मगध, कारुष और हिरण्य प्रदेश - यद्यपि अश्विनी कुमार अंतरिक्ष के देवता हैं और उनका निवास उत्तर कुरु माना गया है, परंतु भारतवर्ष के प्राचीन जनपदों और भौगोलिक क्षेत्रों के साथ उनका गहरा सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और औषधीय अंतर्संबंध रहा है।
प्राचीन प्रदेश आधुनिक भौगोलिक स्थिति अश्विनी कुमार और उनके कुल से संबंध।, कीकट प्रदेश प्राचीन मगध (केंद्रीय व दक्षिण बिहार) औषधीय पहाड़ियों की खोज, ऋग्वैदिक जड़ी-बूटी अन्वेषण।मगध प्रदेश गया, राजगीर, पटना, जहानाबाद क्षेत्र शाकद्वीपीय 'मग्ग' सूर्य-पूजा परंपरा, आरोग्य विज्ञान का केंद्र।कारुष प्रदेश बक्सर, शाहाबाद, सोन नदी का क्षेत्र च्यवन ऋषि का आश्रम, कायाकल्प और सोमरस विजय की भूमि।हिरण्य प्रदेश हिमालय के उत्तर की स्वर्ण-कांति भूमि माता संज्ञा के तप स्थल (उत्तर कुरु) का निकटवर्ती उद्गम क्षेत्र
कीकट और मगध प्रदेश: औषधीय संपदा और सूर्य-कुल परंपरा - प्राचीन वैदिक संहिताओं, विशेषकर ऋग्वेद (3.53.14) में कीकट प्रदेश का उल्लेख मिलता है। उत्तर-वैदिक काल और पुराणों में इसी कीकट को 'मगध' (बिहार का क्षेत्र) कहा गया है। जड़ी-बूटी अनुसंधान का केंद्र: गया, राजगीर, जहानाबाद की 'बराबर' (Barabar) और ब्रह्मयोनि , राजगीर की पहाड़ियाँ प्राचीन काल से ही सघन वनों और दुर्लभ वनस्पतियों से आच्छादित रही हैं। लोक-परंपराओं के अनुसार, अश्विनी कुमारों ने पृथ्वी पर औषधियों की खोज के दौरान मगध की इन पहाड़ियों की यात्रा की थी। शाकद्वीपीय ब्राह्मण और मग्ग परंपरा: मगध भूमि का सूर्य उपासना से अत्यंत प्राचीन संबंध है। यहाँ शाकद्वीप से आए 'मगजक' या 'मग्ग' ब्राह्मणों ने सूर्य पूजा की नींव रखी थी। चूंकि अश्विनी कुमार साक्षात सूर्य के पुत्र हैं, अतः सूर्य-कुल की इस साधना भूमि (मगध) का आरोग्य और अध्यात्म के स्तर पर अश्विनी कुमारों के सिद्धांतों से सीधा जुड़ाव स्थापित होता है।।कारुष प्रदेश: च्यवन ऋषि का आश्रम और सोमरस की विजय भूमि कारुष प्रदेश का विस्तार आधुनिक समय में मध्य प्रदेश के बघेलखंड से लेकर बिहार के बक्सर, भोजपुर , रोहतास , कैमूर और सोन नदी के मैदानी इलाकों तक माना जाता है। कायाकल्प की ऐतिहासिक भूमि: पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार, सोन और गंगा नदी के संगम एवं गंगा , सुन और पुनपुन नदी के मध्य स्थल भूमि समीपवर्ती वनों में हिरण्य प्रदेश ही भृगुवंशी च्यवन ऋषि का आश्रम था। यही वह ऐतिहासिक रंगमंच है जहाँ अश्विनी कुमारों ने आकर च्यवन ऋषि की जर्जर काया को 16 वर्ष के युवक में परिवर्तित किया था। इंद्र के विरुद्ध महायज्ञ: कायाकल्प से प्रसन्न होकर च्यवन ऋषि ने इसी कारुष प्रदेश की भूमि पर राजा शर्याति से विशाल यज्ञ करवाया था और इंद्र के वज्र को स्तंभित करके अश्विनी कुमारों को उनका खोया हुआ सम्मान (सोमरस पीने का अधिकार) दिलाया था। अतः कारुष प्रदेश अश्विनी कुमारों के जीवन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक और वैधानिक विजय का साक्षी है।
हिरण्य प्रदेश (हिरण्यमय वर्ष): पौराणिक भूगोल में महामेरु (हिमालय की उच्च पर्वत श्रेणियों) के उत्तर में स्थित क्षेत्र को हिरण्य प्रदेश कहा गया है। यह क्षेत्र माता संज्ञा के तप स्थल 'उत्तर कुरु' के अत्यंत निकट स्थित है। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों को 'हिरण्यत्वक्' (सोने जैसी कांति वाले) और 'हिरण्यवर्तनी' (स्वर्ण मार्ग पर चलने वाले) कहा गया है, जो इस प्रदेश की भौगोलिक और आध्यात्मिक आभा से मेल खाता है।: विष्णु पुराण के अनुसार, शाकद्वीप पृथ्वी के सात द्वीपों में से एक है, जो अपनी पवित्रता और सूर्य-साधना के लिए प्रसिद्ध था। वहाँ के निवासी वायु और सूर्य जनित रोगों से मुक्त रहने के लिए सूर्य देव और उनके कुल (अश्विनी कुमारों) की स्तुति करते थे। इसी शाकद्वीपीय आरोग्य चेतना का विस्तार बाद में भारत के मगध क्षेत्र में हुआ।
वैश्विक संस्कृतियों में अश्विनी कुमारों का स्वरूप - अश्विनी कुमारों की अवधारणा केवल प्राचीन भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह संपूर्ण इंडो-यूरोपियन (Indo-European) सभ्यताओं में गहराई से रची- गई थी । ।इंडो यूरोपियन मूल चेतना संस्कृति में भारतीय संस्कृति का जुड़वा भाई सूर्यपुत्र एवं देवों के वैद्य अश्विनी कुमार , यूनानी ग्रीक सभ्यता में दियोस्कुरी घोड़ों के रक्षक , रक्षक द्वारा जुड़वा भाई कैस्टपोलक्स एवं ब्लास्टिक सभ्यता में अश्विनीएसूर्यपुत्र के सारथी आरोग्य के प्रतीक जुड़वा दिव्य घोड़े है। यूनानी पौराणिक कथाओं में 'कैस्टर और पोलक्स' (Castor and Pollux) नामक जुड़वां भाइयों का वर्णन मिलता है, जिन्हें सामूहिक रूप से 'डियोस्कुरी' कहा जाता है। अश्विनी कुमारों की भांति वे भी: अद्भुत घुड़सवार और घोड़ों के रक्षक माने जाते हैं। संकट के समय नाविकों और मनुष्यों की रक्षा करने वाले रक्षक देवता हैं।।उनका संबंध भी आकाश के एक विशेष नक्षत्र मंडल (मिथुन राशि या Gemini) से है, ठीक वैसे ही जैसे भारत में इनका संबंध 'अश्विनी नक्षत्र' से है। बाल्टिक और लिथुआनियाई सभ्यता: 'अश्विएनियाई' संस्कृति - बाल्टिक (उत्तरी यूरोप) की प्राचीन लोक-संस्कृति में 'अश्विएनियाई' नामक जुड़वां देवताओं की पूजा की जाती है।।वे दिव्य घोड़ों के रूप में प्रदर्शित किए जाते हैं जो सूर्य की देवी (Saulė) के रथ को खींचते हैं। वे मनुष्यों के घरों को बीमारियों और दुष्ट शक्तियों से बचाते हैं। लिथुआनिया के पारंपरिक घरों की छतों पर आज भी लकड़ी के बने दो घोड़ों के सिरों की आकृतियां लगाई जाती हैं, जो भारतीय 'अश्विनी कुमारों' के प्रतीकात्मक संरक्षण की याद दिलाती हैं। थाई संस्कृति - थाईलैंड की प्राचीन और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में भी ब्रह्मांडीय संतुलन के लिए इन जुड़वां शल्य-चिकित्सक स्वरूपों (सिद्धांत और व्यावहारिक अनुप्रयोग) को आयुर्वेद के प्रभाव स्वरूप मान्यता दी गई ह
अश्विनी कुमार केवल पौराणिक आख्यानों के पात्र नहीं हैं, बल्कि वे सनातन संस्कृति में जन-कल्याण, संपूर्ण स्वास्थ्य चेतना और एकीकृत चिकित्सा विज्ञान (Integrated Medicine) के आदि-प्रतीक हैं।
ऋग्वेद में 'ज्ञान' (नासत्य) और 'क्रिया' (दस्र) के रूप में उनका जो द्विवचन स्वरूप प्रस्तुत किया गया है, वह आज के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है—जहाँ केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके साथ कुशल शल्य-कर्म और सेवा-भाव का होना भी अनिवार्य है। आज भी पारंपरिक वैद्य, आयुर्वेद के चिकित्सक और भारतीय प्रणालियों के अनुयायी किसी भी जटिल चिकित्सा या शल्य-कर्म की शुरुआत में आरोग्यता, चिर-यौवन और आरोग्यता के परम देवता के रूप में अश्विनी कुमारों का पूर्ण श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं।संदर्भ ग्रंथ सूची - ऋग्वेद संहिता - प्रथम, दशम मण्डल (विशेषकर विवाह सूक्त 10.85 एवं अश्विनी सूक्त)। विष्णु पुराण - द्वितीय अंश (भौगोलिक एवं शाकद्वीप वर्णन), चतुर्थ अंश (सूर्य वंश एवं च्यवन कथा)। चरक संहिता - सूत्रस्थान, अध्याय 1 (दीर्घञ्जीवितीयमध्याय - आयुर्वेद अवतरण परंपरा)। पद्म पुराण / स्कंद पुराण - कार्तिक महात्म्य (आमलकी वृक्ष उत्पत्ति प्रसंग)। महाभारत - आदिपर्व (पांडु-माद्री प्रसंग एवं नकुल-सहदेव जन्म)।
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