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हे कविते! तेरे आँगन में प्रणय की फुहार

हे कविते! तेरे आँगन में प्रणय की फुहार

कुमार महेंद्र
मृदुल-मधुर हिय-तरंगिनी,
मनभावन जीवन-श्रृंगार।
प्रेरणा-प्रदीपित भाव-सरिता,
मानवता का दिव्य आधार।
नैतिक चेतन ओजस्विता से,
जन-मन में जागे सत्कार।
हे कविते! तेरे आँगन में प्रणय की फुहार।।


आत्मसात नव-प्रौद्योगिकी,
उज्ज्वल भविष्य-पथ प्रशस्त।
नव-सृजन हेतु सदा अग्रसर,
हर अवरोध स्वयं ही ध्वस्त।
मिटे क्रोध, वैर, निराशा,
झरे हृदय में सुख अपार।
हे कविते! तेरे आँगन में प्रणय की फुहार।।


प्रगाढ़ धर्ममय आस्था-विश्वास,
साम्प्रदायिक सौहार्द-साकार।
अर्थ, भाव, अभिव्यक्ति अमृतमय,
संगति-सान्निध्य सदाबहार।
शुद्ध सात्विक जीवन-मूल्य,
क्षमा, समर्पण, प्रेमाधार।
हे कविते! तेरे आँगन में प्रणय की फुहार।।


सहज सजग पावन दृष्टि,
स्वच्छ-सौम्य आचार-विचार।
स्नेह-सुधा से सिंचित करती,
परिवार, संस्कृति, जग-संसार।
अन्याय-विरुद्ध प्रखर सिंहनाद,
सत्य-विजय के हों विस्तार।
हे कविते! तेरे आँगन में प्रणय की फुहार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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