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ज्येष्ठ मास महात्मय {तेरहवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {तेरहवां अध्याय}

आनन्द हठीला
स्कन्दजी बोले कि हे विप्रलोग ! जब इन्द्र ने राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का समाचार वगैरह श्रीविष्णु भगवान् से निवेदन किया तब विष्णु भगवान् मन से ध्यान कॅर इन्द्र से निश्चित वचन बोले ॥ १ ॥

श्रीविष्णु भगवान् ने कहा कि हे इन्द्र ! मुझको और समर्थ श्रीशिवजी को उन लोगों ने नहीं बुलाया, इस लिये मैं तुमसे उपाय बताता हूँ, तुम यथामति उस उपाय को करो ॥ २ ॥

हे सुव्रत ! मैं तुमको इस अदृश्य करनेवाली विद्या को देता हूँ, तुम पवित्र होकर उस विद्या को ग्रहण करो और एकाकी निर्भय होकर पुनः जाओ ॥ ३ ॥

विधि से उस विद्या का जप करो, 'सावधानी के साथ यज्ञाश्व का हरण करो और उसी तरह मौनपूर्वक कपिल ऋषि के समीप जाओ ॥ ४ ॥

तथा देखकर वहीं शुभकारी यज्ञाश्व को रखकर अपने स्वर्ग को जाओ और पूर्ववत् अपना काम करो ॥ ५ ॥

अन्यथा वे सब मेरे साथ तुमको मारेंगे इसमे संशय नहीं है। विष्णु भगवान् के वचन सुनकर विधिपूर्वक इन्द्र ने स्नान किया ॥ ६ ॥

और अदृश्यकरणी विद्या को ग्रहणकर प्रथम मधुसूदन भगवान् को प्रणाम किया और पूछा कि हे विष्णो ! कपिल मुनि कहाँ पर है १ ॥ ७ ॥

श्रीविष्णु भगवान् बोले कि हे इन्द्र ! कलिङ्ग से पूर्व दिशा में पृथिवी के अन्दर गुफा में कपिल ऋषि ने पाताल के समान महान् भूगृह बनाया है ॥ ८ ॥

उस भूगृह में ध्यानमग्न होकर मुनिश्रेष्ठ कपिज मुनि रहते हैं। विष्णु भगवान् के वचन को सुनकर इन्द्र यज्ञाश्व के समीप गये ॥ ९ ॥

और विष्णु भगवान् से उप-दिष्ट विद्या का ऋषि देवता के सहित जप करते हुये यज्ञाश्व को लेकर शीघ्र चले गये, और उस समय किसी को मालूम नहीं हुआ ॥ १० ॥

एकान्त में ध्यानमग्न कपिल मुनि को देखकर इन्द्र ने विधिवत् प्रणाम किया 'पौर वहाँ हयश्रेष्ठ (यज्ञाश्व) को बॉधकर ॥ ११ ॥

इन्द्र भी अपने नगर (स्वर्ग) को चले गये परन्तु चित् मे शङ्का अधिक बनी रही। इधर यज्ञाश्व के हरण हो जाने पर इयरक्षक एक साथ ॥ १२ ॥

अज्ञान से मोहित होकर राभोंने राजा से आकर कहा कि हे वसुधापते ! यज्ञाश्व कहाँ गया ? अथवा उसको कौन ले गया ? यह हमलोग नही जानते ॥१३॥

हे विप्रलोग ! हम रक्षकों के वचन को सुनकर सगर के पुत्र यज्ञाश्व के अन्वेषग्ण में दश दिशाओं में गगे ॥१४॥

समस्त पृथिवी के तलभाग को देखकर देवलोक देखने के लिये स्वर्ग को आये। बाद नचत्र लोक को गये और इन्द्र की पुरी को गये ॥ १५ ॥

संराय में पड़कर व्याकुल सगरपुत्र इन्द्र के प्रत्येक गृह में और दूसरों के गृह तथा नगर मे ॥ १६ ॥

अटारी, समस्त शाला, वन, उपवन, दिक्पालों के लोक, तदनन्तर ब्रह्मलोक ॥ १७ ॥

कैलास, हिमवान् तथा अन्य अनेकों पर्वत, मेरु पर्वत, समस्त गुफा और शिखर ॥ १८ ॥

गन्धर्व लोक, यच्चलोक तदनन्तर विष्णुलोक मे भी गये इस तरह वे सगरपुत्र समस्त लोकों मे गये ॥ १६ ॥

परन्तु वहाँ यज्ञाश्व को नहीं देखा तब वे लोग पाताल लोक को गये, वहाँ जाकर सात पातालों को देखा, तदनन्तर अपने शिविर को गये ॥ २० ॥

और सब दुखी हो गये तथा प्राणत्याग करने को तत्पर वे सब काल से प्रेरित होकर पृथिवी को खोदने लगे ॥ २१ ॥


अकस्मात् उस विवर से मिला हुआ सौ योजन के विस्तार में इन्द्रालय के समान और मनुष्यों से रहित ॥ २२ ॥


दिव्य गहर (गुफा) देखकर सबके सब उस गहर में चले गये। वहाँ जाकर कमलरज्जू से बँधा यज्ञाश्व को देखा ॥ २३ ॥


तदनन्तर वहॉपर ध्यान में लीन कपिल नामक ऋषि को देखा, जो कि मन से सृष्टि, संहार, शाप और अनुग्रह करने वाले है ॥ २४ ॥


कपिल ऋपि के प्रभाव से अपरिचित उन मूर्ख सगरपुत्रों ने कपिलमुनि को चोर समझ कर कहा कि इसीने घोड़ा की चोरी की है और भय से यहाँ ध्यान लगाकर बैठा है ॥ २५ ॥


हमलोगों के भय से भूगृह बनाकर दुष्ट यहाँ ऋषिवत् बैठा है। इसको अच्छी तरह बॉधकर राजा सगर के पास ले चलेंगे ॥ २६ ॥


यह कहकर उन शूर सगरपुत्रों ने बड़ा कोलाहल किया और उन कपिल मुनि को वॉध दिया तथा कतिपय लोगों ने उनपर प्रहार भी किया ॥ २७॥


ध्यान को त्याग कर जवतक कपिलमुनि उनको देखते है तबतक वे सब सगरपुत्र कपिलमुनि के नेत्राग्नि से जलकर भस्म हो गये ॥२८॥


इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसाद-व्यासेन कृतायां भापाटीकायां त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥


क्रमशः...


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